5 मई को आने वाली है कयामत, खौफ में भारत-पाक- बांग्लादेश के मौलाना.

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सिटी पोस्ट लाइव : वक्फ एक अरबी शब्द है जिसका मतलब ठहरना या पड़ाव होता है. ऐसा दावा किया जाता है कि जब कोई संपत्ति अल्लाह के नाम से वक्फ कर दी जाती है तो वो हमेशा के लिए अल्लाह के नाम पर हो जाती है. फिर उसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता है. वक्फ संपत्ति को खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है और न ही इसका ट्रांसफर हो सकता है. वक्फ बोर्ड के पास अभी पूरे भारत में लगभग 8.7 लाख संपत्तियां हैं, जो करीब 9.4 लाख एकड़ जमीन में फैली हुई हैं. इनकी कुल कीमत लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपए अनुमानित है. दुनिया में भारत के पास सबसे ज्यादा वक्फ संपत्ति है. भारत में सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीन वक्फ बोर्ड के पास है.

कई मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने वक्फ बिल को लेकर संसद से सड़क तक विरोध किया है. सबकी आपत्तियां मुख्य रूप से नए बिल में वक्फ बोर्ड की संरचना, संपत्ति के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कई अहम बदलाव किए गए हैं. सरकार का कहना है कि वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए ये जरूरी कदम हैं. जबकि विपक्षी दलों का तर्क है कि यह बिल अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है. सरकार ने वक्फ बोर्डों और सेंट्रल वक्फ काउंसिल के ढांचे में बदलाव किया है. इसमें अब गैर मुस्लिम सदस्यों को भी शामिल किया गया है.

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वक्फ संपत्तियों के सर्वे का अधिकार वक्फ आयुक्त से हटाकर जिले के कलेक्टर को दे दिया गया है. सरकार के कब्ज़े वाली जमीनों पर विवाद की स्थिति में कलेक्टर के आदेश को अंतिम माना गया है. हालांकि, ये कहा गया है कि कलेक्टर के फैसले के खिलाफ ट्रिब्यूनल जा सकते हैं, मगर वक्फ ट्रिब्यूनल के निर्णय को अब अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा. इसके फैसलों को अब हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

वक्फ बाय यूजर यानी जो संपत्ति धार्मिक कार्यों के लिए इस्तेमाल में थी, उसे अब वक्फ नहीं माना जाएगा. नए प्रावधान में इसे हटाया गया है. ‘वक़्फ़ बाय यूजर’ के सिद्धांत का मतलब है कि ऐसी संपत्ति जो मस्जिदों और कब्रिस्तानों जैसे धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए निरंतर उपयोग के कारण वक्फ बन जाती है. भले ही इसे औपचारिक रूप से वक्फ घोषित न किया गया हो. वक्फ के लिए यह शर्त जोड़ी गई है कि व्यक्ति को कम से कम पिछले पांच साल से इस्लाम धर्म का पालन करने वाला होना चाहिए.


मुसलमानों को बिल के जिन प्रावधानों पर सबसे ज्यादा आपत्ति है, उनमें वक्फ के ढांचे से जुड़े बदलाव शामिल हैं. पहले वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत केंद्रीय वक्फ काउंसिल और राज्य वक्फ बोर्ड में केवल मुस्लिम सदस्य ही हो सकते थे, जिनमें निर्वाचित और नामांकित दोनों तरह के सदस्य शामिल थे. अब सभी सदस्यों की नियुक्ति सरकार करेगी और उसमें कम से कम दो गैर मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य कर दिया गया है.पहले के कानून में मंत्री को छोड़कर सभी सदस्यों का मुसलमान होना जरूरी था. अब नए कानून में केंद्रीय वक्फ काउंसिल के 22 में से 12 और स्टेट वक्फ बोर्ड के 11 में से 7 सदस्य गैर मुस्लिम हो सकते हैं. मुस्लिमों को यही चिंता ज्यादा सता रही है.


वक्फ संशोधन बिल में वक्फ संपत्तियों के सर्वे का अधिकार अब जिले के कलेक्टर को दे दिया गया है. पहले यह अधिकार वक्फ कमिश्नर के पास हुआ करता था. सरकार के कब्जे वाली वक्फ संपत्तियों को लेकर विवाद की स्थिति में अब कलेक्टर का फैसला प्रभावी माना जाएगा. बिल में यह प्रावधान किया गया है कि अगर कोई सरकारी जमीन वक्फ के रूप में पहचानी गई है, तो उसे वक्फ नहीं माना जाएगा. अनिश्चितता की स्थिति में कलेक्टर यह तय करेगा कि संपत्ति पर किसका स्वामित्व है और वह अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगा. इसके अलावा, अब वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को अंतिम नहीं माना जाएगा. इन फैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी. इससे मामलों के निपटारे में ज्यादा समय लग सकता है.

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