नीतीश के खिलाफ अभी से शुरू हो गयी है BJP की घेराबंदी…

City Post Live

 

सिटी पोस्बिट लाइव : बिहार का जातीय चक्रव्यूह ऐसा है, जिसे कोइ कास्ट सर्वे, कास्ट सेन्सस और राजनीतिक विश्लेषक न ठीक से समझ सकता है, न समझा सकता है. बीजेपी के नेता के  कुर्मी रैली नीतीश कुमार की घेरेबंदी के लिए थी या निशांत कुमार की एंट्री को ग्रांड बनाने की कोई कोशिश.रैली में बुलाए जाने पर भी नीतीश कुमार नहीं पहुंचे थे. कुर्मी जाति जैसे भूमिहारों की तरह ही आबादी में भले कम हो, लेकिन लैंड होल्डिंग और प्रति व्यक्ति आय के मामले में अन्य पिछड़ी जातियों से कहीं आगे है पिछले 19 साल से कुर्मी समाज के नेता नीतीश कुमार ही सत्ता पर काबिज हैं.

फिर भाजपा विधायक और कुर्मी रैली के आयोजक मंटू सिंह यह क्यों कहते नजर आएं कि कुर्मी जाति कई उपजातियों में बंटी हुई है और जब तक कुर्मी जाति की तमाम उपजाति एकजुट नहीं हो जाती है, उन्हें उनका वाजिब हक नहीं मिल सकता है और यह रैली कुर्मी जाति की उपजातियों को एकजुट रखने के लिए हो रही है. तो, सबसे बड़ा सवाल यही है कि भूमि, प्रति व्यक्ति आय में आगे रहने वाली जाति, 18 साल से एक मुख्यमंत्री देने वाली जाति आखिर अब कौन सा बाजिव हक़ मांग रही है? 

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यह रैली भाजपा द्वारा नीतीश कुमार की घेरेबंदी के अलावा कुछ नहीं है. इसलिए, कि इस वक्त नीतीश कुमार प्रगति यात्रा पर है, यह चर्चा आम है कि उनकी तबीयत इन दिनों नासाज रहती है और निशांत कुमार की एंट्री लगभग तय है. जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है की निशांत कुमार के जद(यू) ज्वाइन करने से सर्वाधिक नुकसान उस भाजपाई कंधे को होगा, जो पिछले 18 साल से नीतीश कुमार की पालकी इस आस में उठाए जा रहा है कि नीतीश कुमार जैसे बफर एजेंट के हटते ही बिहार की राजनीति द्वी-ध्रुवीय हो जाएगी और भाजपा फिर अकेले दम पर सत्ता में आ जाएगी.

 इसके लिए बाकायदा कई सालों से तैयारी भी चल रही थी. आरसीपी सिंह हो, उपेन्द्र कुशवाहा हो, प्रशांत किशोर हो, संजय झा हो, ये सारे लोग जद(यू) में यूं ही नहीं थे/हैं और यूं ही नहीं निकाले गए/निकल गए या अब तक बने हुए हैं.चिराग पासवान जैसे “राजनीतिक हनुमान” स्लीपिंग मोड में रह कर दूर से ही खबरें बताने वाले “संजय दृष्टि” वाले लोग इस भाजपाई उम्मीद के वाहक थे/हैं कि नीतीश जी जब संन्यास आश्रम को प्रस्थान करेंगे तब जद(यू) की क्लींजिंग कैसे की जाएगी. इस बीच निशांत कुमार के आने की खबर से वह उम्मीद, वह सपना टूटता नजर आ रहा है. ऐसे में, भारतीय संस्कृति की राजनीति करने वाली पार्टी अपने ही एक विधायक को आगे कर के  कुर्मी रैली जैसी जातीय रैली कर के कोई पतित-पावनी गंगा जैसी शुद्ध राजनीति तो नहीं


जद(यू) के मुखिया नीतीश कुमार अपने “तीर” को अब किस दिशा में उडाएंगे, कोई नहीं जानता. लेकिन, इतना तो तय है कि वे अपने जीते-जी अपने हाथों से बनाई पार्टी को डूबते देखना नहींचाहेंगे और उन्हें 2020 के चुनाव के समय से ही (चिराग पासवान के अकेले चुनाव लड़ने वाले निर्णय) यह भलीभांति एहसास हो गया है कि उनकी पार्टी को ख़त्म करने के लिए भाजपा कुछ भी कर सकती है. 3 फीसदी वोट के लिए भाजपा नीतीश कुमार से पंगा नहीं ले सकती.यह रैली महज कुर्मी समाज को खींचने के लिए नहीं थी. यह एक परसेप्शन बनाने के लिए थी कि अब नीतीश कुमार का  समय ख़त्म हो गया है.

नीतीश कुमार ने कभी 3 फीसदी वोट के बदौलत राजनीति की ही नहीं. उनकी बुनियाद में वहीं “मंडलवादी” राजनीति है, जिसके दम पर आज भी राजद बिहार की बड़ी मजबूत पार्टी बनी हुई है. तो, इंतज़ार कीजिये. देखिये कि निशांत कुमार की “ताजपोशी” कब होती है, कैसे होती है. भाजपा के लोग इस ताजपोशी मंत्रोच्चार करते नजर आएँगे या एक बार फिर नीतीश कुमार की अंतरात्मा सुबह की सैर पर लालू प्रसाद यादव के आवास की ओर निकल पड़ेगी?

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