सिटी पोस्ट लाइव : केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान बीजेपी से नाराज नहीं हैं । वो विधान सभा चुनाव मुख्यमंत्री बनने के लिए नहीं बल्कि मुख्यमंत्री बनने के लिए जरूरी तैयारी के लिए लड़ना चाहते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसलिए बने हुए हैं क्योंकि उनके पास 16 से 20 फीसदी वोट बैंक है। नीतीश कुमार के बाद उनकी जगह लेने के लिए चिराग पासवान को भी अपने 6 फीसदी वोट शेयर को बढ़ाकर जेडीयू के बराबर लाना होगा।
बीजेपी को ये बखूबी पता है कि नीतीश कुमार के बाद उसके पास अपनी पार्टी मे ऐसा कोई नेता नहीं है जो 16 से 20 फीसदी वोट बैंक अपने बूते पर बढ़ा पाए। चिराग पासवान को बीजेपी दूसरा नीतीश कुमार बनाना चाहती है। बीजेपी को पता है कि चिराग दलित नेता हैं साथ ही उनकी स्वीकार्यता दूसरे वर्गों मे भी है। उनमे नीतीश कुमार की जगह लेने की क्षमता है। उनके जरिए दलित वोट बैंक की गोलबंदी तो होगी ही साथ ही सामान्य वर्ग के नाराजगी का खतरा भी नहीं रहेगा। इसी रणनीति के तहत बीजेपी शाहबाद मे उनका इस्तेमाल करना चाहती है। शाहबाद आज की तारीख मे महागठबंधन के कब्जे मे है।
बीजेपी बिहार में अपना चेहरा नहीं बना पाई है. बीजेपी की इस शून्यता के कारण एलजेपी (आरवी) नेता को इसका फायदा उठाने के प्रयास में हैं. अगर राज्य में बीजेपी का कोई सशक्त चेहरा होता तो संभव है कि चिराग केंद्र की राजनीति में ही रहते. लेकिन अब जब नीतीश कुमार के बाद एनडीए में एक तरह से चेहरे को लेकर खालीपन है तो चिराग पासवान इसका फायदा उठा रहे हैं और अपने पत्ते सावधानी से खेल रहे हैं. चिराग पासवान को लेकर सवाल यह भी है कि वह शाहाबाद क्षेत्र में पैठ क्यों बनाना चाहते हैं. दरअसल, 2020 में शाहाबाद में एनडीए को बहुत बड़ा झटका लगा था. शाहाबाद क्षेत्र के -भोजपुर, रोहतास, कैमूर और बक्सर जिलों की 22 सीटों में 20 सीटों पर महागठबंधन के उम्मीदवारों ने कब्जा जमाया था, जबकि एनडीए गठबंधन को मात्र दो सीटें ही मिल पाई थी. लेकिन दलित वोटों की गोलबंदी चिराग के चेहरे पर हो सकती है और यह एनडीए के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है.
बीते 30 मई को जब पीएम नरेंद्र मोदी बिहार दौरे पर आए थे तो सासाराम के विक्रमगंज में चुनावी सभा की थी. अब जब चिराग पासवान ने शाहाबाद का चुनावी मैदान अपने लिये चुना है तो इसके पीछे बीजेपी की सोनची समझी रणनीति हो सकती है। चिराग के चेहरे की बदौलत दलित वोटों को एनडीए की ओर बीजेपी लाना चाहती है। चिराग पासवान फिलहाल बिहार की राजनीति में अगले नीतीश कुमार बननने की चाहत रखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि नीतीश कुमार की जेडीयू की तरह अभी उनकी पार्टी का वजूद नहीं है. चिराग पासवान कितना वोट शेयर अपने लिए बढ़ा पाते हैं यह देखने वाली बात होगी.
पिछले विधान सभा चुनाव मे चिराग फैक्टर ने जेडीयू का खेल बिगाड़ दिया था। जेडीयू 43 सीटें जीत पाई. महागठबंधन में राजद को 23.11% मत मिले और 75 सीटें जीती. कांग्रेस 9.48% और 19 सीटें जीती, जबकि बसपा को 1.49% मत मिले और 1 सीट जीती. जबकि, एआइएमआइएम 1.24 % मत मिले और 5 सीटें जीता.आज की तारीख मे नीतीश कुमार बीजेपी की मजबूरी हैं लेकिन चिराग पासवान बीजेपी के लिए भविष्य की राजनीति के लिए जरूरी हैं.