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शादी के मौके पर दूल्हे को घोड़ी पर बैठाकर बारात निकालने की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है। यह एक तरह का रीति-रिवाज होता है,जिसका नाम ‘घुड़ सवार’ है। इसमें दूल्हा सफेद घोड़ा पर चढ़कर बाराती के लिए निकलता है। प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं की सवारी भी घोड़े पर होती थी, जो उनके साहस और प्रतिष्ठा की पहचान थी। आइए जानते है इसके पीछे की परंपरा और दिलचस्प कहानी क्या है।
दरअसल, आज भी दूल्हा बाराती जाने के लिए घोड़े को पहली पसंद मानते है। यह स्टाइलिश के साथ शाही अंदाज का प्रतीक माना जाता है। ऐसा मान्यता है कि दूल्हे की घोड़ी पर सवारी करना,यह जीवन के नए सफर में सफलता और शक्ति का आशीर्वाद देती है। साथ ही पुराने समय में यह सवारी सुरक्षा का भी प्रतीक मानी जाती थी। हालांकि उस समय में दूल्हे के साथ बारात में उसके रिश्तेदार और मित्र हथियारों से लैस होकर चलते थे। घोड़ों की मुकाबले में घोड़ियों को संभालना आसान माना जाता है। क्योंकि वो चंचल, बुद्धिमान और फुर्तीली होती हैं। वहीं, सफेद रंग का घोड़ी इस्तेमाल करने का कारण है वो पवित्रता, प्रेम, सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
जैसा कि आप सभी जानते है कि बाराती के समय दूल्हे के साथ एक छोटा लड़का भी रहता है,जिसे ‘साहबला’ कहते है। इसे बच्चे की मासूमियत और दूल्हे की भविष्य में परिवार की देखभाल करने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है। बता दें, इस पर बैठना अर्थात प्रतीकात्मक परीक्षा पास करना है। इसका मतलब हुआ कि दूल्हा अब मानसिक और भावनात्मक पूरी तरह से तैयार है।