शिवदीप लांडे के राजनीति में एंट्री लेते ही भीतरी–बाहरी की लड़ाई शुरू.

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव : चुनाव से 6 महीने पहले एक बार फिर से बिहार पुलिस में सिंघम के नाम से मशहूर पूर्व IPS शिवदीप लांडे ने अपना राजनीतिक दल बना लिया है.उन्होंने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.उनकी पार्टी का नाम  हिंद सेना है. हालांकि, खुद कहां से लड़ेंगे, इसका खुलासा अभी नहीं किया है. बिहार में ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई IPS खुद अपनी पार्टी बनाकर सियासत में एंट्री लेने जा रहा है. अब तक जितने भी ब्यूरोक्रेट्स नौकरी छोड़कर बिहार में चुनाव लड़े वे किसी न किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े हैं. कुछ सफल हुए तो बहुत सारे विफल हुए.

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ऐसे में सवाल ये कि महाराष्ट्र के रहने वाले शिवदीप लांडे के लिए बिहार में सियासत की राह कितनी मुश्किल होने वाली है?क्या जाति की राजनीति के लिए देश भर में जानी जाने वाली बिहार शिवदीप लांडे को स्वीकार करेंगी?अपनी पार्टी की घोषणा के दौरान शिवदीप लांडे ने कहा-‘जो बिहार में बदलाव चाहता है, उसका पार्टी में स्वागत है. बिहार के युवा बदलाव चाहते हैं. कई राजनीतिक पार्टियों ने मुझे राज्यसभा भेजने, मंत्री बनाने और मुख्यमंत्री बनाने का ऑफर दिया, लेकिन मैं बिहार में बदलाव लाना चाहता हूं, इसलिए मैंने नई पार्टी बनाने का फैसला किया.

उनके इस बयान के तुरंत बाद बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार ने पोस्ट किया, ‘इतिहास प्रमाण है बिहार ने देश पर शासन किया है. गणतंत्र की जननी है. बिहार में कोई भी बिहारी ही मुख्यमंत्री होगा. महाराष्ट्र की हिंद सेना बिहार में नहीं चलेगी.इन दो बयानों से साफ है शिवदीप लांडे की सियासत में सबसे बड़ा रोड़ा उनका मराठी होना है. उन्हें बाहरी बताकर बिहार की सियासत से दूर करने की कोशिश की जाएगी.दरअसल शिवदीप लांडे महाराष्ट्र के अकोला के रहने वाले हैं. IPS में उनका चयन बिहार कैडर में हुआ था. इस दौरान उनकी तैनाती बिहार के अलग-अलग जिलों में हुई.‘बिहार में जाति लोगों के जड़ में है. ये राज्य देशभर में कास्ट पॉलिटिक्स के लिए जाना जाता है. इस स्थिति में शिवदीप लांडे के विकास की बात शायद ही कोई सुनें.’यहां लालू यादव को बिहार का नेता बाद में पहले यादव का नेता कहा जाता है. नीतीश कुमार पिछले 20 वर्षों से कोइरी-कुर्मी की सियासत करते आ रहे हैं.’

‘बिहार का जातीय समीकरण ही है कि जीतन राम मांझी एक सीट जीत कर केंद्र में मंत्री बन जाते हैं. यही यहां की हकीकत भी है. जाति की सियासत वाले इस राज्य में शिवदीप लांडे शायद ही अपने लिए कोई जगह बना पाएं.’शिवदीप लांडे के पास बताने और दिखाने के लिए केवल अपनी क्लीन और सिंघम वाली इमेज है. इसके अलावा उनके पास कोई उपलब्धि नहीं है, जिसे बताकर वे लोगों के साथ कनेक्ट कर सकें. लेकिन ये प्रयोग बिहार में कई बार फेल हो चुका है.’डीपी ओझा जैसे बोल्ड और दबंग छवि वाले आईपीएस, जिन्होंने डीजीपी रहते बाहुबली और सीएम की सांठ-गांठ का काला चिट्‌ठा बाहर कर दिया था.’जब वो चुनाव मैदान में आए तो जनता ने उनकी जमानत जब्त कर दी थी. ऐसे में शिवदीप लांडे को लोग स्वीकार करें, इसकी भी संभावना कम दिखाई देती है.

‘चुनाव से पहले पॉलिटिकल पार्टियां कई प्रयोग करती हैं. शिवदीप लांडे उस रणनीति का भी एक हिस्सा हो सकते हैं.दरअसल, शिवदीप लांडे भले चुनाव नहीं जीतें, लेकिन कुछ वोट इधर-उधर कर सकते हैं. विधानसभा चुनाव में ये बहुत मैटर करता है. बहुत कम वोट के मार्जिन से जीत-हार का फैसला तय होता है.

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