नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक: क्यों चार दिन तक चलता है छठ महापर्व?…

Ritu Raj

छठ महापर्व, जो मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है, चार दिनों तक चलने वाला एक अनुष्ठानिक और आध्यात्मिक पर्व है। यह सूर्य देव और छठी मैया (षष्ठी देवी) की उपासना का पर्व है, जो प्रकृति, स्वास्थ्य और समृद्धि से जुड़ा है। चार दिनों का यह पर्व अत्यंत कठिन नियमों और अनुशासन के साथ मनाया जाता है। प्रत्येक दिन का अपना विशिष्ट महत्व होता है। आइए जानते हैं कि यह पर्व चार दिन क्यों मनाया जाता है और इसके पीछे की वजह:

नहाय-खाय (पहला दिन):
यह दिन पवित्रता और शुद्धिकरण से शुरू होता है। व्रती (उपासक) नदी या जलाशय में स्नान करते हैं और घर की साफ-सफाई के बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हैं। इस दिन केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन (जैसे चना दाल, कद्दू की सब्जी और चावल) खाया जाता है। वहीं, यह दिन व्रती को शारीरिक और मानसिक रूप से व्रत के लिए तैयार करता है। यह शुद्धिकरण का प्रतीक है, जो आत्मा और शरीर को पवित्र करता है।
खरना (दूसरा दिन):
इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद रसियाव (गुड़ की खीर) और रोटी का प्रसाद बनाकर छठी मैया को अर्पित करते हैं। इसके बाद व्रती और परिवार वाले प्रसाद ग्रहण करते हैं। दरअसल, खरना का उपवास कठिन तपस्या का प्रतीक है। यह दिन व्रती के संकल्प को मजबूत करता है और अगले दो दिनों के कठिन उपवास के लिए मानसिक शक्ति प्रदान करता है।
डूबते सूर्य की पूजा – संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन):
इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के समय नदी या जलाशय में जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य (जल अर्पण) देते हैं। बांस की टोकरी में फल, ठेकुआ, और अन्य प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। हालांकि, डूबता सूर्य जीवन के अंत और नवीकरण का प्रतीक है। इस दिन सूर्य की उपासना से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
उगते सूर्य की पूजा – उषा अर्घ्य (चौथा दिन):
इस दिन व्रती सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और इसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत तोड़ा जाता है। प्रसाद वितरण के साथ पर्व समाप्त होता है। वहीं, उगता सूर्य नई शुरुआत, आशा और ऊर्जा का प्रतीक है। यह दिन सूर्य की कृपा से जीवन में समृद्धि और खुशहाली की कामना के साथ समापन का प्रतीक है।

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गौरतलब है कि आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व की बात करें तो चार दिनों का यह पर्व प्रकृति के साथ सामंजस्य और आत्म-अनुशासन को दर्शाता है। सूर्य की उपासना सूर्य की गति (डूबना और उगना) के साथ तालमेल रखती है, जो जीवन चक्र को दर्शाता है। यह शरीर को डिटॉक्स करने और मानसिक शांति प्रदान करने में भी मदद करता है।

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