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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए नामांकन वापसी के अंतिम दिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बड़ी राहत मिली है। नरकटियागंज की निवर्तमान विधायक रश्मि वर्मा और चनपटिया के पूर्व विधायक प्रकाश राय, दोनों ही बागी नेताओं ने अपना नामांकन पत्र वापस ले लिया है। इस घटनाक्रम ने उन दोनों सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों के लिए चुनावी राह को काफी हद तक आसान बना दिया है।
रश्मि वर्मा ने किया ‘सरेंडर’
नरकटियागंज सीट से टिकट कटने के बाद निर्दलीय ताल ठोकने वाली रश्मि वर्मा ने आखिरकार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद पार्टी प्रत्याशी संजय पांडेय के पक्ष में अपना नामांकन वापस ले लिया। रश्मि वर्मा का बागी होना भाजपा के लिए बड़ा खतरा था, क्योंकि वह दो बार इस सीट से विधायक रह चुकी थीं। पार्टी के ‘डैमेज कंट्रोल’ प्रयासों की सफलता से अब इस सीट पर एनडीए खेमा मजबूत स्थिति में आ गया है। दिलचस्प बात यह है कि नरकटियागंज से कांग्रेस के पूर्व विधायक विनय वर्मा ने भी अपना नामांकन वापस ले लिया है।
चनपटिया में भी ‘मान-मनौव्वल’ सफल
वहीं, चनपटिया विधानसभा क्षेत्र में भी भाजपा को बड़ी सफलता मिली। 2015 में इस सीट से विधायक रह चुके प्रकाश राय ने भी गुरुवार को अपना नामांकन वापस ले लिया। श्री राय पार्टी के स्थानीय नेताओं पर टिकट कटवाने का आरोप लगाकर बेहद नाराज थे और उन्होंने विरोध में नामांकन दाखिल कर जनसंपर्क भी तेज कर दिया था।
नामांकन वापस लेने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फैसला उन्होंने पार्टी के शीर्ष पदाधिकारियों के आग्रह पर लिया है। 2020 के आम चुनाव में भी उन्हें टिकट नहीं मिला था, तब भी वह नाराज हुए थे, लेकिन प्रदेश नेतृत्व के समझाने पर शांत हो गए थे। इस बार 2025 में भी टिकट न मिलने से नाराज होकर उन्होंने बागी तेवर अपनाए थे, लेकिन पार्टी ने समय रहते स्थिति संभाल ली।
नरकटियागंज में महागठबंधन की ‘दोस्ताना’ लड़ाई
नामांकन वापसी के अंतिम दिन नरकटियागंज सीट पर एक और दिलचस्प समीकरण देखने को मिला। महागठबंधन की ओर से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के दीपक यादव और कांग्रेस के शाश्वत केदार दोनों ने ही नामांकन दाखिल किया था। चर्चा थी कि नेतृत्व स्तर पर किसी एक उम्मीदवार का पर्चा वापस कराया जाएगा, लेकिन अंतिम समय तक सहमति नहीं बन सकी। ऐसे में अब नरकटियागंज में महागठबंधन के दोनों प्रमुख घटक दलों के बीच ही ‘दोस्ताना लड़ाई’ (Friendly Fight) होने की संभावना बन गई है, जिससे एनडीए उम्मीदवार को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिल सकता है।
भाजपा के दो प्रमुख बागियों का अंतिम समय में मान जाना यह दर्शाता है कि शीर्ष नेतृत्व ने चुनावी समीकरणों को बिगड़ने से बचाने के लिए प्रभावी हस्तक्षेप किया, जिससे पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों की जीत की संभावनाएँ बढ़ गई हैं।