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वर्ष 2026 का सूर्योदय भोजपुर की ऐतिहासिक धरती के लिए नई उम्मीदें और अटूट आस्था लेकर आया है। जहाँ दुनिया के अन्य हिस्सों में लोग नाच-गाकर नए साल का जश्न मना रहे हैं, वहीं आरा स्थित शक्तिपीठ माँ आरण्य देवी के मंदिर में भक्ति और श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिला। नए साल के पहले दिन माता का आशीर्वाद लेने के लिए श्रद्धालुओं का ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि मंदिर परिसर से लेकर सड़कें तक केसरिया रंग और जयकारों से सराबोर हो गईं।
ब्रह्म मुहूर्त से ही लगीं लंबी कतारें
भीषण ठंड और कोहरे की परवाह किए बिना, भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था। सुबह करीब 4 बजे ब्रह्म मुहूर्त से ही मंदिर के कपाट खुलने से पहले ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। हाथों में चुनरी, नारियल और प्रसाद लिए भक्त अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। पूरा वातावरण “जय माता दी” और “माँ आरण्य देवी की जय” के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान रहा।
त्रेता और द्वापर युग से जुड़ा है गौरवशाली इतिहास
आरण्य देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता का गवाह है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस सिद्धपीठ का संबंध त्रेता और द्वापर दोनों युगों से है। कहा जाता है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम धनुष यज्ञ के लिए बक्सर जा रहे थे, तब उन्होंने यहाँ रुककर माता की आराधना की थी। वहीं, द्वापर युग में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहाँ शक्ति की उपासना की थी। यही ऐतिहासिक महत्व इस मंदिर को पूरे भारत में विशेष बनाता है।
सुख-समृद्धि की कामना
नए साल के इस खास मौके पर स्थानीय लोगों के साथ-साथ पड़ोसी जिलों और राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। भक्तों ने माँ के चरणों में शीश नवाकर वर्ष 2026 के लिए सुख, शांति और आरोग्य की मन्नतें मांगीं। श्रद्धालुओं का कहना है कि साल के पहले दिन माँ के दर्शन से पूरे वर्ष सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
प्रशासन की ओर से भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। आरण्य देवी धाम में उमड़ी यह भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के इस दौर में भी लोगों की आस्था की जड़ें अपनी संस्कृति और संस्कारों में कितनी गहरी जमी हुई हैं।