भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने एक बार फिर इस संवेदनशील विषय को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले में अदालत का निर्णय न केवल एक परिवार की पीड़ा का अंत है, बल्कि यह गरिमामय जीवन और मृत्यु के अधिकार की कानूनी व्याख्या को भी स्पष्ट करता है।

हरीश राणा मामला;
32 वर्षीय हरीश राणा का जीवन साल 2013 में एक दुखद हादसे के बाद पूरी तरह बदल गया था। चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट आई, जिससे वह ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (लगातार अचेत अवस्था) में चले गए। एम्स (AIIMS) की रिपोर्ट ने पुष्टि की कि हरीश के ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने ‘पैसिव इच्छामृत्यु’ की अनुमति देते हुए कहा कि जब मरीज खुद फैसला लेने में असमर्थ हो, तो परिजनों को उसके सर्वोच्च हित (Best Interest) में निर्णय लेने का अधिकार है।

पैसिव इच्छामृत्यु क्या है?
भारत में कानूनी रूप से ‘पैसिव इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) को मान्यता प्राप्त है। इसका अर्थ है कि मरीज को जीवित रखने वाले लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटा लेना। इलाज बंद कर देना ताकि प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो सके। बता दें, यह ‘एक्टिव इच्छामृत्यु’ से अलग है, जिसमें घातक इंजेक्शन देकर जान ली जाती है (जो भारत में प्रतिबंधित है)।
कहाँ और कैसे शुरू हुई यह प्रथा?
| देश | स्थिति | ऐतिहासिक संदर्भ |
| नीदरलैंड | सबसे पहले वैध (2002) | 1973 के ‘पोस्टमा केस’ के बाद कानून बना। |
| स्विट्जरलैंड | असिस्टेड सुसाइड | डॉक्टर की मदद से जीवन समाप्त करने की अनुमति। |
| बेल्जियम | वैध (2002) | सख्त नियमों के साथ लागू। |
| भारत | पैसिव इच्छामृत्यु वैध | 2018 के ऐतिहासिक फैसले के बाद अनुमति मिली। |
नीदरलैंड में इस कानून की नींव ‘पोस्टमा केस’ से पड़ी थी। इसमें एक डॉक्टर ने अपनी गंभीर रूप से बीमार मां की अत्यधिक पीड़ा को देखते हुए उन्हें मृत्यु में मदद की थी। हालांकि डॉक्टर को दोषी पाया गया, लेकिन सजा बहुत कम दी गई, जिससे इस बहस को बल मिला कि असहनीय पीड़ा में किसी को जबरन जीवित रखना मानवाधिकार का उल्लंघन है।