बिहार में क्या करना चाहती है कांग्रेस, प्रेशर पॉलिटिक्स या फिर अकेले लड़ने की तैयारी?

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव :बिहार कांग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव देखा जा रहा है.इस  बदलाव को बिहार में कांग्रेस के ‘अपनी परंपरागत वोट बैंक को फिर से सहेजना है. बिहार में कांग्रेस  अपने पुराने जनाधार को वापस पाने की  कवायद में जुटी है.कांग्रेस के परंपरागत वोटर सवर्ण, मुस्लिम और दलित रहे हैं और यह इस बार भी इसी को साधने की कवायद में पार्टी जुटी है. लेकिन, अखिलेश सिंह क्यों हटाए गए  यह बड़ा सवाल है, जिसकी चर्चा सियासी गलियारों में खूब हो रही है. राज्यसभा के सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के काफी नजदीकी माने जाते हैं. अध्यक्ष पद जाने के बाद भी उन्होंने ये कहने से परहेज नहीं किया कि उनके नेता लालू यादव हैं.वो इस बात को हमेशा स्वीकार करते हैं कि लालू प्रसाद यादव ने उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाया है. शायद यही बात अखिलेश प्रसाद सिंह के विरुद्ध चली गई.

 बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बदल दिये गए हैं और अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह विधायक राजेश कुमार को कांग्रेस की कमान सौंपी गई है.बिहार कांग्रेस का यह बदलाव राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है. एक दलित विधायक राजेश कुमार को बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष (चेहरा) बनाया गया है, मगर जिन्हें हटाया गया है वह काफी महत्वपूर्ण है.सवर्ण चेहरा अखिलेश सिंह को अध्यक्ष पद से हटाकर एक दलित को कांग्रेस की कमान सौंपना और फेस बनाना निश्चित तौर पर कांग्रेस में राजनीति की दृष्टि से यह बड़ा परिवर्तन कहा जा रहा है. इसके दूरगामी प्रभाव भी पार्टी में पड़ेगा, इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि, यह प्रभाव अधिक सकारात्मक होगा या फिर नकारात्मक, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी.पुराने कांग्रेस के अध्यक्ष और नए कांग्रेस के अध्यक्ष के मिलने के दौरान सामने आई है. दो दिन पहले दोनों की मुलाकात तो आमने-सामने की हुई, अभिवादन भी हुआ, लेकिन न तो नजरें मिलीं और न गले मिले. खास बात यह कि न कोई गुफ्तगू ही हो पाई. अब इस तस्वीर को बिहार के सियासत के जानकारी अपने नजरिये से देख रहे हैं.

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बिहार में कांग्रेस ने अब तक 42 अध्यक्ष बनाए हैं. इनमें कई दलित चेहरे भी कांग्रेस की कमान संभाल चुके हैं सबसे पहले वर्ष 1977 में मुंगेरीलाल कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए थे. वहीं, वर्ष 1985 में डूमरलाल बैठा, इसके बाद वर्ष 2013 में अशोक चौधरी दलित अध्यक्ष बने थे. अब राजेश कुमार चौथे कांग्रेस अध्यक्ष हैं जो दलित बिरादरी से आते हैं. राजेश कुमार बिहार के औरंगाबाद जिले के कुटुंब विधानसभा क्षेत्र से एमएलए हैं. इनके पिता दिलकेश्वर राम भी कांग्रेस में 1980 और 85 में विधायक रह चुके थे. जाहिर तौर पर पार्टी संगठन में बदलाव होते रहे हैं और एक बार फिर हुआ है. लेकिन, सवाल यह है कि कांग्रेस ने और चुनाव से पहले अध्यक्ष को क्यों बदला, क्या यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है?


 वर्ष 2022 के दिसंबर महीने में अखिलेश प्रसाद सिंह को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था. कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है. ऐसे में कायदे से अखिलेश प्रसाद सिंह का कार्यकाल दिसंबर 2025 में समाप्त होना था, लेकिन बीच में ही कांग्रेस ने नेतृत्व परिवर्तन कर दिया. सियासत के जानकार इसको यहां से भी जोड़ रहे हैं कि बिहार कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने के बाद कृष्णा अल्लावरु और कांग्रेस के अन्य प्रभारी ने राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से मुलाकात नहीं की है. इसी बीच कांग्रेस को लेकर राहुल गांधी ने नया दांव चला और कन्हैया कुमार (सवर्ण चेहरा) को ‘नौकरी दो, पलायन रोको यात्रा’ का चेहरा बनाकर लालू प्रसाद यादव और अखिलेश प्रसाद सिंह दोनों को असहज कर दिया.


वर्ष 1989 के भागलपुर दंगे के बाद वर्ष 1990 के से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ तो होता ही गया. दूसरी ओर मुस्लिम और दलित वोटों पर राजद ने कब्जा कर सत्ता में पकड़ मज़बूत बना ली और कांग्रेस के जनाधार हड़प लिया. पार्टी की स्थिति ये हो गई कि वर्ष 2010 में अकेले लड़ी कांग्रेस को केवल चार सीट मिली थी. फिर वह राजद की बैशाखी के आसरे ही आगे बढ़ती रही और आज तक वह बैशाखी नहीं छोड़ पाई.अब जब राजनीति का दौर बदला है और केंद्र में बीजेपी मजबूत है और प्रदेश में जदयू और बीजेपी की संयुक्त ताकत है तो कांग्रेस नए तेवर के साथ बढ़ाना चाहती है और अपने जनाधार को मजबूत करना चाहती है. ऐसे में अखिलेश प्रसाद सिंह और लालू यादव की नजदीकी कांग्रेस के बढ़ने में एक बड़ी बाधा मानी जा रही थी. जाहिर तौर पर पार्टी ने अगर इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए फैसला किया होगा तो आने वाले समय में बिहार की राजनीति की दिशा बदलती दिख सकती है.

बिहार में दलित चेहरे को आगे करने से कांग्रेस को बहुत फायदा हो जाएगा इस बात की कोई गारंटी नहीं है. पार्टी का संगठन तास के 52 पत्तों की तरह होता है, जिसे पार्टी समय-समय पर फेंटते रहती है. कभी गुलाम तो कभी बादशाह,  कभी बीवी तो कभी इक्का को आगे किया जाता है. दलित चेहरे की सियासत से बहुत कुछ कांग्रेस प्राप्त कर पाएगी, ऐसा सोचना समय के अनुकूल नहीं है, क्योंकि जब तक महागठबंधन में कांग्रेस रहेगी और जब तक राजद का वर्चस्व रहेगा तो कांग्रेस का कोई भी अध्यक्ष हो, कुछ नहीं होगा. अब अगर कांग्रेस की प्लानिंग यह है कि वह राजद के चंगुल से निकलना चाहती है, तब तो इस दिशा में यह कदम सही कहा भी जा सकता है. लेकिन, क्या पार्टी के अंदरखाने अखिलेश सिंह को हटाए जाने से और दलित चेहरा को आगे ले आने से कांग्रेस के भीतर भी सब ठीक ही रहेगा, यह सवाल बड़ा है

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