बुधवार को पॉक्सो कोर्ट में शंभू गर्ल्स हॉस्टल के मालिक मनीष रंजन की जमानत याचिका पर गरमागरम बहस हुई। लंबी सुनवाई के बाद भी मनीष को आज राहत नहीं मिली और मामले की अगली सुनवाई कल के लिए टाल दी गई है।

CBI की कार्यशैली पर कोर्ट के कड़े सवाल;
सुनवाई के दौरान CBI द्वारा पेश की गई रिपोर्ट और दस्तावेजों से कोर्ट संतुष्ट नज़र नहीं आया। कोर्ट ने एजेंसी की “सुस्ती” पर कड़ी टिप्पणी करते हुए निम्नलिखित सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि जब केस CBI को सौंपा गया, तो क्या उन्हें पता नहीं था कि मनीष कस्टडी में है? 14 फरवरी से 11 मार्च तक की उसकी हिरासत को कोर्ट ने ‘लापरवाही’ का नतीजा बताते हुए पूछा कि इस देरी का हर्जाना (Compensation) कौन भरेगा? कोर्ट ने पाया कि मामले की पहली जांच अधिकारी (IO) रौशनी, SIT और अब CBI, इन तीनों की थ्योरी और बयान आपस में मेल नहीं खा रहे हैं। हालांकि, घटना के दो महीने बीत जाने के बाद भी अब तक मौत के सटीक कारणों का पता न चल पाना जांच पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
मनीष रंजन और नीलम अग्रवाल के बयानों में अंतर;
| पक्ष | बयान/दावा |
| मनीष रंजन | 5 जनवरी को पावापुरी में थे। 7 जनवरी की सुबह उन्हें हॉस्टल संचालिका नीलम अग्रवाल ने घटना की जानकारी दी। |
| नीलम अग्रवाल (SIT के अनुसार) | नीलम ने दावा किया कि उन्होंने मनीष को कुछ नहीं बताया, शायद उन्हें वार्डन से पता चला होगा। |
| SIT (पटना पुलिस) | पुलिस ने बताया कि 4 फरवरी को जेल में मनीष से पूछताछ की गई थी, हालांकि उसके परिणामों पर स्पष्टता की कमी दिखी। |
गवाहों को धमकी और नया ऑडियो सबूत;
पीड़िता के वकील ने कोर्ट में एक ऑडियो क्लिप पेश की है। वकील का दावा है कि इस मामले से जुड़े गवाहों को डराया-धमकाया जा रहा है ताकि वे अपने बयान बदल दें। इस नए मोड़ ने मामले की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियां इस मामले में ‘मूकदर्शक’ बनी हुई हैं, जिससे न्याय मिलने में देरी हो रही है।