बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का नाम तेजी से उभरा है। उनका राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा, बल्कि विवाद, संघर्ष और रणनीति से भरा हुआ है। कहा जाता है कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक कठिन दौर के बाद की, जब वे जेल गए थे। इस घटना के पीछे उस समय के प्रभावशाली नेता लालू प्रसाद यादव की राजनीति का असर बताया जाता है। जेल से बाहर आने के बाद सम्राट चौधरी ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का दामन थामा। यहीं से उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। बताया जाता है कि उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु लालू यादव से आग्रह कर पहली बार मंत्री पद हासिल किया, जो उनके करियर का अहम मोड़ बना।

सम्राट चौधरी के राजनीतिक सफर में उनके पिता शकुनी चौधरी की बड़ी भूमिका रही है। वे जनता दल यूनाइटेड के एक मजबूत नेता माने जाते थे। 1990 के दशक में जब बिहार में लालू यादव का दबदबा था, तब शकुनी चौधरी उन चुनिंदा नेताओं में थे जिन्होंने नीतीश कुमार का साथ दिया। 1994 में जब नीतीश कुमार ने लालू यादव के खिलाफ बगावत कर समता पार्टी बनाई, तब शकुनी चौधरी उनके साथ मजबूती से खड़े रहे। उन्होंने खासकर मुंगेर और खगड़िया क्षेत्रों में संगठन को मजबूत किया और कुशवाहा समाज को नीतीश के पक्ष में लामबंद किया। साल 2000 में नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत न होने के कारण उन्हें सिर्फ 7 दिनों में इस्तीफा देना पड़ा। उस समय शकुनी चौधरी का समर्थन उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण था। इसके बाद 2005 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण बदले। भारतीय जनता पार्टी और जदयू गठबंधन को बहुमत मिला, और नीतीश कुमार एक मजबूत सरकार के मुख्यमंत्री बने। इस जीत में “लव-कुश” (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण की बड़ी भूमिका रही, जिसे बनाने और मजबूत करने में शकुनी चौधरी का योगदान माना जाता है।

बिहार की राजनीति में “लव-कुश” समीकरण;
कुर्मी और कोइरी (कुशवाहा) समुदाय की कुल आबादी लगभग 7% के आसपास मानी जाती है। ओबीसी और ईबीसी मिलाकर राज्य की करीब 60% से ज्यादा आबादी बनाते हैं। ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) की अवधारणा खुद नीतीश कुमार ने दी थी। हालांकि, इस समीकरण ने 2005 के बाद से नीतीश कुमार को लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने में मदद की।

सम्राट चौधरी क्यों बने प्रमुख चेहरा?
सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाने के पीछे कई राजनीतिक कारण बताए जाते हैं। दरअसल, वे कुशवाहा समाज से आते हैं, जिससे “लव-कुश” समीकरण को मजबूत बनाए रखने में मदद मिलती है। साथ ही डिप्टी सीएम बनने के बाद उन्होंने लगातार नीतीश कुमार के साथ काम किया और उनका विश्वास जीता। वे कई मौकों पर उनके साथ हर महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मौजूद रहे। वे भारतीय जनता पार्टी की ओर से ऐसे नेता माने जाते हैं जो नीतीश कुमार के साथ सहज तालमेल बना सके। 2026 में कई सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी की ओर इशारों में समर्थन दिखाया। जमुई और सहरसा की सभाओं में उन्होंने सम्राट की तारीफ की। मंच पर उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें आगे बढ़ाने का संकेत दिया। हालांकि, इन घटनाओं को राजनीतिक हलकों में “संकेत” के रूप में देखा गया कि भविष्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है।