संसद में बोलने का ‘कोटा’: जानें कैसे तय होता है किसका भाषण घंटों चलेगा और किसे मिलेंगे सिर्फ 2 मिनट?…

Ritu Raj

संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस जारी है। प्रधानमंत्री मोदी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे प्रमुख नेताओं ने अपने विचार रखे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सदन में मौजूद सैकड़ों सांसदों में से किसे कितनी देर बोलने का मौका मिलता है? इसके पीछे एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया और तय नियम होते हैं।

लोकसभा में बोलने का समय तय करने की जिम्मेदारी ‘बिजनेस एडवाइजरी कमेटी’ (BAC) की होती है। यह एक महत्वपूर्ण समिति है, जिसमें कुल 26 सदस्य होते हैंष इसमें 15 लोकसभा से और 11 राज्यसभा से होते है। लोकसभा में इसकी अध्यक्षता स्पीकर करते हैं, जबकि राज्यसभा में सभापति इसके प्रमुख होते हैं। खास बात यह है कि इस समिति में कोई भी मंत्री शामिल नहीं होता। यही समिति तय करती है कि किस मुद्दे या बिल पर कितनी देर चर्चा होगी और किस दिन कौन सा विषय सदन में लिया जाएगा।

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सांसदों की संख्या के आधार पर तय होता है समय;
बहस में किसी पार्टी को मिलने वाला समय उसकी लोकसभा में मौजूद ताकत पर निर्भर करता है। जितने ज्यादा सांसद, उतना ज्यादा वक्त। BAC की सिफारिशों के आधार पर स्पीकर अलग-अलग दलों को उनकी संख्या के अनुपात में समय बांटते हैं। इसी वजह से बड़ी पार्टियों के नेताओं को ज्यादा समय मिलता है, जबकि छोटे दलों के सांसदों को सीमित समय में अपनी बात रखनी पड़ती है।

पार्टियों का वर्गीकरण;
सदन में सुविधा के लिए पार्टियों को चार श्रेणियों में बांटा गया है:
बड़े दल: जिनके कम से कम 15 सांसद हों
मझले दल: जिनकी संख्या 5 से 14 के बीच हो
छोटे दल: जिनके 2 से 4 सांसद हों
निर्दलीय और मनोनीत सदस्य
नोट: इन सभी समूहों के लिए अलग-अलग समय सीमा तय होती है ताकि कार्यवाही संतुलित ढंग से चल सके।

वक्ताओं का चयन कैसे होता है?
जब किसी विषय पर चर्चा होनी होती है, तो हर पार्टी अपने वक्ताओं की सूची तैयार करके स्पीकर को देती है। पार्टी नेतृत्व ही तय करता है कि कौन सांसद कब बोलेगा। स्पीकर उसी क्रम के अनुसार सदस्यों को बोलने का अवसर देते हैं। हालांकि, पार्टियां जरूरत पड़ने पर इस क्रम में बदलाव भी कर सकती हैं।

अगर कोई सांसद सूची में न हो तो?
अगर किसी सांसद का नाम सूची में नहीं है, लेकिन वह बोलना चाहता है, तो उसे स्पीकर को अलग से सूचना देनी होती है। ऐसे मामलों में स्पीकर के पास यह अधिकार होता है कि वे परिस्थिति के अनुसार उसे बोलने का मौका दें या नहीं। वहीं, निर्दलीय सांसदों को भी पहले से सूचना देकर अपने निर्धारित समय में ही बोलने का अवसर मिलता है। इस तरह तय नियमों और प्रक्रियाओं के जरिए संसद की कार्यवाही को व्यवस्थित और संतुलित रखा जाता है।

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