:आनंद, आशुतोष, नागमणि संभालेंगे शाहाबाद-मगध, क्या लालू का बैकवर्ड फॉर्मूला बचेगा
‘मैं शपथ लेता हूं कि जब तक जीवित हूं, गेरुए में जिंदा रहूंगा। मरुंगा तो इस गेरुए के गौरव को ऊंचा करते हुए मरूंगा।’
सिटी पोस्ट लाइव : तेजतर्रार IPS ऑफिसर आनंद मिश्रा भूमिहार-ब्राह्मण एकता मंच के आशुतोष कुमार और पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि के BJP में शामिल होने के पीछे बड़ी रणनीति है. 14वीं बार पार्टी बदलने वाले नागमणि को छोड़ दें, तो तीनों में से एक भी कोई चुनाव नहीं जीता है.फिर BJP को इनकी जरूरत क्यों पड़ी? शाहाबाद और मगध में 2015 से लगातार BJP को हार का सामना करना पड़ रहा है. ये पूरा दांव इन दोनों इलाकों की 71 सीटों को ध्यान में रखकर खेला गया है. यहां BJP के पास लालू और लेफ्ट के बैकवर्ड फॉर्मूले की काट नहीं है. आनंद मिश्रा, आशुतोष और नागमणि के जरिए पार्टी इसी फॉर्मूले का तोड़ना चाहती है.
दरअसल आनंद मिश्रा, आशुतोष कुमार और नागमणि में एक बात कॉमन है- शाहाबाद. आनंद मिश्रा बक्सर से हैं और वहां पैठ बना रहे हैं. आशुतोष कुमार जहानाबाद और अरवल समेत मगध के पूरे इलाके में भूमिहारों के बीच जमीन तैयार कर रहे हैं. नागमणि की पूरी सियासत शाहाबाद और मगध के इर्द-गिर्द है. NDA 2015 के बाद से लगातार शाहाबाद और मगध में हार रही है.2020 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन का लगभग सफाया ही गया था.
शाहाबाद के इलाके में NDA खासकर BJP के पास लोकल लीडरशिप की कमी बड़ी परेशानी रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में बक्सर के कैंडिडेट मिथिलेश तिवारी गोपालगंज के थे. आरा से लड़े आरके सिंह सुपौल के थे. काराकाट के उपेंद्र कुशवाहा वैशाली के थे. इसके उलट महागठबंधन के सभी कैंडिडेट लोकल थे.‘इसका खामियाजा ये हुआ कि NDA को शाहाबाद में उस कम्युनिटी के वोट भी नहीं मिल पाए, जिसके कैंडिडेट को गठबंधन ने चुनाव लड़ाया था. पार्टी पर इसका नेगेटिव असर पड़ा.’
शाहाबाद के इलाके में कुशवाहा कम्युनिटी हार-जीत तय करने में अहम फैक्टर हैं. काराकाट लोकसभा सीट पर ही एक लाख से ज्यादा कुशवाहा वोटर्स हैं. 2015 से पहले NDA का वोटबैंक थे.2024 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव ने कुशवाहा कार्ड इस्तेमाल किया. महागठबंधन ने 7 कुशवाहा कैंडिडेट को टिकट दिया. इनमें दो शाहाबाद में थे. ये एक्सपेरिमेंट कामयाब रहा.शाहाबाद की दो सीटों काराकाट से भाकपा (माले) के राजराम सिंह कुशवाहा और औरंगाबाद से राजद के अभय सिंह कुशवाहा चुनाव जीत गए. शाहाबाद की सभी 4 लोकसभा सीटें महागठबंधन ने जीतीं. NDA खाता भी नहीं खोल पाया.
BJP कुशवाहा समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को आगे बढ़ा रही है.कुशवाहा कम्युनिटी के बड़े नेता के तौर पर गिने जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा पहले से NDA के साथ हैं.अब नागमणि को BJP में शामिल कराकर ये मैसेज देने की कोशिश की गई है कि NDA कुशवाहा कम्युनिटी के साथ है.आनंद मिश्रा ब्राह्मण कम्युनिटी से आते हैं. IPS की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए थे. पॉलिटिक्स की शुरुआत से ही वे युवाओं के बीच पॉपुलर हैं. आशुतोष पिछले 12 साल से लगातार भूमिहारों के मुद्दे उठा रहे हैं.आशुतोष बिहार में सवर्ण आरक्षण का मुद्दा उठाने वाले नेताओं में शामिल हैं. इसके लिए कई बार आंदोलन किए. इस वजह से वे युवाओं को अपने तरफ गोलबंद करने में कामयाब भी रहे हैं. उनकी गिनती भूमिहारों के मुद्दों को मजबूत तरीके से उठाने वाले नेता की है. इस वजह से सवर्ण युवाओं का बड़ा तबका उन्हें सपोर्ट करता है. BJP इन दोनों का फायदा विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती है.
बिहार में जातीय समीकरण ही सबसे बड़ा निर्णायक फैक्टर होता है. BJP बिहार में लगातार इस पर प्रयोग करते रही है. लालू यादव की सरकार में पार्टी ने नंदकिशोर यादव को आगे बढ़ाया था.’नरेंद्र मोदी आए, तो पार्टी में नित्यानंद राय का उभार हुआ. हालांकि वे यादव को नहीं तोड़ पाए. नीतीश कुमार सत्ता में आने के बाद यादव कम्युनिटी के खिलाफ सभी पिछड़ी जातियों का ध्रुवीकरण कर दिया.अब BJP यही प्रयोग करके शाहाबाद और मगध में खोई जमीन हासिल करना चाहती है. इससे पहले पार्टी इसी इलाके से आने वाले संतोष सिंह को कैबिनेट मंत्री बना चुकी है. सुनील पांडेय के बेटे विशाल प्रशांत को पार्टी ने पहले ही तरारी से चुनाव लड़ाने का ऐलान कर दिया है. ऐसा करके मगध-शाहाबाद में भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कुशवाहा, सभी कम्युनिटी के नेताओं को जगह मिल गई है.
नागमणि कुशवाहा कम्युनिटी के कद्दावर नेता रहे जगदेव प्रसाद के बेटे हैं. जगदेव प्रसाद को बिहार का लेनिन कहा जाता है. आज भी शाहाबद के इलाकों खास तौर पर अरवल, सासाराम और काराकाट में उनका कोर बेस है.पिता की तरह नागमणि ने भी कुशवाहा समुदाय पर पकड़ बनाई है. वे केंद्र में मंत्री रह चुके हैं. पत्नी सुचित्रा सिन्हा नीतीश कैबिनेट में मंत्री रही हैं. नागमणि बिहार के उन चुनिंदा नेताओं में से हैं, जो चारों सदनों लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं.लेकिन 72 साल की उम्र में 14 बार पार्टी बदल चुके हैं. तीसरी बार BJP में शामिल हुए हैं. बिहार की सभी बड़ी पार्टियों में रह चुके हैं. स्थायित्व न होने की वजह से वोटर कितना भरोसा करेंगे, ये तय नहीं है. आखिरी बार 2024 में BSP की सीट पर चतरा सीट से चुनाव लड़े थे. उन्हें सिर्फ 11,950 वोट मिले और उनकी जमानत जब्त हो गई थी.
ब्राह्मण कम्युनिटी से आते हैं. IPS की नौकरी में रहते हुए 150 एनकाउंटर किए. सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं. 2011 बैच के IPS थे. असम-मेघालय कैडर में रहे. ज्यादातर युवा इनसे प्रभावित हैं. लोकसभा चुनाव में निर्दलीय लड़े और 45 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए.2023 में पुलिस की नौकरी छोड़ने के बाद आनंद मिश्रा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP से चुनाव लड़ने की कोशिश की लेकिन टिकट नहीं मिला तो बक्सर से निर्दलीय लड़े, लेकिन हार गए. जनसुराज से एक्टिव पॉलिटिक्स की शुरुआत की. जनसुराज के यूथ विंग के अध्यक्ष रह चुके हैं. एक साल बाद ही BJP में आ गए. यहां BJP के दूसरे ब्राह्मण नेताओं से मुकाबला होगा.
सवाल- आशुतोष कुमार कितना bhumihar वोट दिला पायेगें?
भूमिहार कम्युनिटी के मुद्दे उठाते रहे हैं. 13 साल से बिहार की राजनीति में एक्टिव हैं. भूमिहार-ब्राह्मण एकता मंच और राष्ट्रीय जन-जन पार्टी बनाकर पूरे बिहार में सवर्णों का नेटवर्क तैयार किया. 2020 का विधानसभा चुनाव लड़वा चुके हैं. 2020 के विधानसभा चुनाव में 45 कैंडिडेट उतारे, लेकिन लगभग सभी की जमानत जब्त हो गई. खुद कभी चुनाव नहीं जीते हैं. भूमिहारों से बाहर बहुत मजबूत आधार नहीं है. BJP के भूमिहार लीडर्स के बीच जगह बनाना चुुनौती होगी