तेजस्वी की घेराबंदी में जुटी है कांग्रेस,बदल दिया अपना प्रदेश अध्यक्ष.

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव :बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस बड़ा खेल करनेवाली है.कांग्रेस पार्टी ने लालू यादव को तगादा संदेश देने के लिए उनके चहेते डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया है.उनकी जगह अपने दलित नेता राजेश कुमार को प्परदेश अध्ड़यक्ष बना दिया है. बिहार में जिस तरीके से कांग्रेस लगातार एक के बाद एक फैसले ले रही है, इसका असर गठबंधन पर भी पड़ सकता है. लालू यादव कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को बिहार की  सियासत में देखना पसंद नहीं करते हैं, उन्हें अब कांग्रेस  बिहार में आगे कर दिया है. कांग्रेस सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी के भरोसेमंद अल्लावरु पार्टी में लालू के भरोसेमंद प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह की छुट्‌टी कर सकते हैं. उनकी जगह किसी दलित नेता को प्रदेश की कमान सौंपी जा सकती है.खास बात है कि बिहार की कमान संभालने के बाद अभी तक अल्लावरु ने न ही लालू के दरबार में हाजिरी लगाई है और न ही गठबंधन दल के नेता तेजस्वी यादव से मुलाकात की है.इस बीच अब उन्होंने अपना तुरुप का इक्का चल दिया है. लालू और तेजस्वी विरोध के कारण अपने फायरब्रांड नेता कन्हैया कुमार को बिहार से दूर रख रही कांग्रेस 6 साल बाद उनको आगे कर चुकी है. 16 मार्च से कन्हैया ‘पलायन रोको नौकरी दो’ यात्रा निकालकर बिहार की सियासत में अपना पांव जमाने में जुटे हैं.

अल्लावरू राहुल गांधी के भरोसेमंद हैं.उन्हें पता है कि  बिहार में एक तबका ऐसा है, जो ना लालू के साथ जाना चाहता और ना NDA के साथ.उस तबके को ये मैसेज देना चाहते है कि अब कांग्रेस अपनी खुद की राजनीति करेगी, किसी के इशारे पर नहीं करेगी. महाराष्ट्र और दिल्ली में हार के बाद कांग्रेस ने अचानक अपनी नीतियों में बदलाव किया है. पहले तो दिल्ली में अकेले चुनाव लड़ी. यहां पार्टी हारी, लेकिन वोट शेयर बढ़ा. इसके बाद राहुल गांधी ने गुजरात जाकर कहा कि कांग्रेस के भीतर कई नेता बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा.ऐसे में अब इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस अभी से ही 2029 की तैयारी में जुट गई है.’कांग्रेस फिलहाल सत्ता में आने और विधानसभा में सीटें जीतने के बजाय अपनी जमीन बनाने की कोशिश कर रही है. पार्टी को लग रहा है कि यहां विधानसभा की सीटें जीतने के बजाय पार्टी को मजबूत करना और लालू की पॉकेट की पार्टी की छवि से बाहर आना ज्यादा जरूरी है.

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‘यादव और मुस्लिम पहले से ही RJD के साथ इंटैक्ट हैं. ऐसे में राहुल गांधी राज्य के लगभग 20 फीसदी दलित वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की मुहिम में जुटे हैं. यही कारण है कि वे लगातार संविधान और दलितों के मुद्दों पर बात कर रहे हैं. फॉरवर्ड हमेशा से कांग्रेस का वोटर रहा है, जो पिछले एक दशक में लगातार छिटका है. अब राहुल गांधी की कोशिश एक बार फिर से अपने खोए जनाधार को वापस हासिल करने की है. अब राहुल गांधी को ये समझाया गया है कि हमें सीटों से ज्यादा अपनी पार्टी को खड़ा करना है. ताकि लोकसभा में इसका फायदा मिल सके. राहुल को ये समझाया गया है कि विधानसभा में कितनी सीटें जीतते हैं इसका कांग्रेस पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा. इसका सीधा असर तेजस्वी यादव पर पड़ेगा.

राहुल गांधी की नई नीतियों का सीधा असर बिहार में गठबंधन पर पड़ सकता है. पिछले लगभग 25-30 सालों से कांग्रेस यहां लालू के कंधे पर ही राजनीति कर रही है. गठबंधन में वही होते आया है जो लालू चाहते हैं.अभी तक ये मैसेज गया है कि कांग्रेस के सारे बड़े नेता बिहार में RJD की जेब में है। कांग्रेस के उम्मीदवार और सीटें भी अघोषित रूप से लालू तय कर रहे थे.कांग्रेस के बिहार में एक्टिव होने के बाद तेजस्वी यादव ने कांग्रेस नेतृत्व से अपनी नाराजगी जाहिर की है. सूत्रों की मानें तो उनकी सोनिया गांधी और राहुल गांधी से सीधी बात हुई है. इसके बाद 12 मार्च को राहुल गांधी ने बिहार कांग्रेस की समीक्षा बैठक को भी टाल दिया है.

कांग्रेस की सेंट्रल लीडरशीप का बिहार में दखल का सीधा असर पार्टी के इंटरनल कलह को बढ़ा सकता है. इसके रुझान भी दिखने लगे हैं. अल्लावरू के एक्टिव होते ही प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह शांत हो गए हैं.अखिलेश सिंह अगर ऐसे मौके पर पार्टी एक्टिविटी से किनारे होते हैं तो पार्टी को दो नुकसान होगा. बिहार कांग्रेस के पास फिलहाल इस कद का कोई नेता नहीं है, जो लालू से सीधा डील कर सके. अखिलेश सिंह भले ग्राउंड लेवल पर पार्टी को मजबूत नहीं कर सके हो, लेकिन आर्थिक तौर पर पार्टी को सपोर्ट करने में उनकी बडी़ भूमिका है. बिहार में कांग्रेस की जो भी एक्टिविटी हुई है, उसमें उनका बड़ा रोल माना जा रहा है.

बिहार में आज कांग्रेस की स्थिति यह है कि पिछले 2 साल में पार्टी के 2 प्रदेश प्रभारी बदल गए, लेकिन अध्यक्ष अपनी कमेटी का गठन नहीं कर पाए. अभी प्रदेश अध्यक्ष के अलावा मीडिया प्रभारी और कोषाध्यक्ष के अलावा कोई भी पद फंक्शनल नहीं है. प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह की बार-बार कोशिश करने के बाद भी कमेटी का गठन नहीं हो पाया है.यहां सांसद, विधायक और विधानसभा में नेता विधायक दल सबकी अपनी-अपनी राय है. इस बीच पप्पू यादव कांग्रेस में अपना एक अलग धड़ा बना चुके हैं.

2020 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ी, जिसमें से 19 सीटों पर जीत मिली. विधानसभा चुनाव के बाद RJD के अंदर से आवाज आई थी कि कांग्रेस को इतनी सीटें नहीं दी गई होती तो महागठबंधन का प्रदर्शन बेहतर होता और तेजस्वी मुख्यमंत्री बनने से नहीं चूकते.विधानसभा चुनाव के बाद हुए उपचुनावों में इसी वजह से कई बार कांग्रेस-RJD के बीच आर-पार जैसी लड़ाई दिखी. अब कांग्रेस कम से कम इस चुनाव में अपनी पुरानी 70 सीटें हर हाल में हासिल करना चाहती हैं.

कांग्रेस के इंटरनल सर्वे में ये जानकारी निकलकर सामने आ रही है कि पार्टी 50 सीटों पर मजबूत स्थिति में है. इसके लिए कांग्रेस आलाकमान गठबंधन के सहयोगियों के साथ कई सीटों की अदला-बदली भी कर सकती है.कांग्रेस की नई रणनीति पर RJD केवल नजर बनाए हुए है।.न लालू यादव इस पर कुछ बोल रहे हैं और न ही तेजस्वी. लोकसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन की सीट शेयरिंग का फॉर्मूला से लेकर कैंडिडेट सिलेक्शन तक में लालू का दबदबा रहा था.लेकिन इसबार कांग्रेस को ये पता है कि विधान सभा चुनाव जितने हारने से उसकी सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़नेवाला.ये चुनाव तो तेजस्वी यादव का भविष्य तय करनेवाला है.ऐसे में कांग्रेस आरजेडी पर दबाव बनाकर ज्यादा से ज्यादा वैसी सीटें लेना चाहती है, जहाँ उसके जितने की संभावना ज्यादा हो.

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