बिहार विधानसभा चुनाव 2025: क्या दोहराया जाएगा 2010 का इतिहास? दावों, तैयारियों और सच्चाई की परख

Deepak Sharma

सिटी पोस्ट लाइव
पटना :
बिहार की सियासी ज़मीन एक बार फिर गर्म होने लगी है। साल 2025 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। सत्तारूढ़ गठबंधन हो या विपक्षी खेमा — हर कोई अपने-अपने समीकरण बिठाने और पुराने रिकॉर्ड तोड़ने के मूड में है। इस बार सवाल बड़ा है: क्या 2010 जैसी जीत दोहराई जा सकती है?

सत्ताधारी एनडीए की मंशा: 225 सीटों का लक्ष्य : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में जदयू विधायकों की बैठक में भविष्य की चुनावी रणनीति पर चर्चा करते हुए सभी से जनता के बीच सक्रिय रहने को कहा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि 2025 का चुनाव बेहद अहम होगा और पार्टी को 2010 से बेहतर प्रदर्शन करना है। उस चुनाव में एनडीए ने कुल 206 सीटें जीती थीं — जदयू को 115 और भाजपा को 91। इस बार नीतीश ने 225 सीटों का संकल्प दिलवाया है।

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भाजपा भी पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में है। पार्टी के बिहार प्रभारी विनोद तावड़े के अनुसार, हालिया लोकसभा चुनावों में एनडीए को 243 विधानसभा क्षेत्रों में से 174 पर बढ़त मिली है। उनका मानना है कि जनता का रुझान एनडीए के पक्ष में है और राज्य में एक बार फिर स्थिर सरकार बनेगी।

विपक्षी महागठबंधन की चुनौतियाँ और समीकरण : महागठबंधन के लिए यह चुनाव आसान नहीं रहने वाला। जहां कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की मंशा जताई है, वहीं भाकपा-माले ने 60 सीटों की मांग रख दी है। इससे गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। राजद की अगुवाई में बना यह मोर्चा अंदरूनी मतभेदों से जूझ रहा है, जो एकजुटता के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।

विपक्ष का तर्क है कि राज्य में बेरोजगारी, महंगाई और विकास कार्यों की सुस्त रफ्तार ने जनता को नाराज़ किया है और यही नाराज़गी बदलाव की वजह बनेगी।

2010 का इतिहास या 2025 की नई पटकथा? : 2010 का विधानसभा चुनाव जदयू-भाजपा गठबंधन के लिए ऐतिहासिक रहा था। अब सवाल यह है कि क्या 2025 में इससे भी बड़ा जनादेश मिल सकता है? एनडीए का आत्मविश्वास अपने स्थान पर है, लेकिन ज़मीनी मुद्दे और जनता का मूड इन दावों की असली कसौटी होंगे।

निष्कर्ष: किस ओर जाएगा जनादेश? : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 राज्य की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। जहां एक ओर एनडीए रिकॉर्ड तोड़ने के मूड में है, वहीं विपक्ष अपने मतभेदों के बीच नया समीकरण खोज रहा है। जनता किसे मौका देगी, यह चुनाव प्रचार, गठबंधन की स्थिति और स्थानीय मुद्दों पर निर्भर करेगा। फिलहाल सभी की नज़रें चुनावी मोर्चे पर टिक गई हैं — और खेला अभी बाकी है।

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