टूटा दिल, बढ़ा तनाव… गम में लोग शराब का सहारा क्यों लेते हैं?…

Ritu Raj

दुख, दिल टूटने या गहरे इमोशनल दर्द के दौर में कई लोग अनजाने में शराब की ओर आकर्षित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि एक-दो पैग पीने से मन हल्का होगा, बेचैनी कम होगी या कुछ समय के लिए दर्द सुन्न पड़ जाएगा। दरअसल यह सिर्फ आदत या शौक नहीं, बल्कि दिमाग और भावनाओं से जुड़ी एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। शराब मस्तिष्क के उन हिस्सों पर असर डालती है जो तनाव, डर और उदासी को नियंत्रित करते हैं, जिससे अस्थायी तौर पर राहत का भ्रम पैदा होता है। इसी वजह से मुश्किल हालात में लोग इसे भावनात्मक सहारे के रूप में देखने लगते हैं।

शराब सीधे तौर पर दिमाग के सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर असर डालती है, जिससे उसकी गतिविधि धीमी पड़ जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि इमोशनल दर्द की तीव्रता कुछ समय के लिए कम महसूस होने लगती है। यह सुन्न करने वाला प्रभाव दुखद यादों और भावनाओं को जैसे धुंधला कर देता है, इसलिए गहरे गम से गुजर रहा व्यक्ति इसे तात्कालिक राहत के रूप में महसूस करता है। शराब पीने पर दिमाग में डोपामाइन नामक केमिकल रिलीज होता है, जो खुशी और संतोष की भावना से जुड़ा होता है। यही वजह है कि थोड़ी देर के लिए उदासी की जगह हल्की गर्माहट, सुकून या उत्साह महसूस होने लगता है। इससे मस्तिष्क को यह भ्रम होने लगता है कि हालात बेहतर हो रहे हैं। इसके साथ ही शराब प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स की सक्रियता को कम कर देती है, जो सोच-विचार, आत्म-नियंत्रण और निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार होता है। इस हिस्से के सुस्त पड़ते ही व्यक्ति कम आत्म-जागरूक महसूस करता है और बार-बार अपनी परेशानियों के बारे में सोचने से राहत पाने लगता है।

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कई लोगों के लिए शराब उन भावनाओं से बचने का सबसे आसान और तुरंत असर दिखाने वाला जरिया बन जाती है, जिनसे वे जूझना नहीं जानते। अपनी भावनाओं को समझने और उनसे निपटने के बजाय वे बेहतर महसूस करने के लिए शराब पर निर्भर हो जाते हैं। साथ ही कई संस्कृतियों में गम के समय शराब पीना सामान्य या स्वीकार्य व्यवहार माना जाता है। फिल्मों, गीतों और दोस्तों की महफिलें भी यह धारणा मजबूत करती हैं कि एक पैग दर्द कम कर सकता है। उदासी अक्सर इंसान को बेबस और असहाय महसूस कराती है। ऐसे में शराब भावनाओं की तीव्रता घटाकर यह एहसास देती है कि व्यक्ति अपने दर्द पर काबू पा सकता है, भले ही यह नियंत्रण हकीकत में सिर्फ एक अस्थायी और भ्रामक भावना ही क्यों न हो।

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