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वट सावित्री व्रत का पर्व परंपरा, श्रद्धा और भक्ति के माहौल में उल्लास के साथ मनाया गया। इस विशेष दिन पर सुहागिन महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर वट वृक्ष की पूजा की और अपने पति की लंबी उम्र की कामना की। महिलाएं सुबह से ही पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर पूजा स्थलों पर पहुंचीं। उन्होंने पूजा की थाल सजाई, वट वृक्ष की परिक्रमा की और वट के पत्तों को सिर पर रख वृक्ष को गले लगाया। इस दौरान महिलाएं श्रद्धा भाव से निर्जला व्रत रखकर पूजा-अर्चना करती दिखीं।
पूजा के दौरान पंडितों ने वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा सुनाई, जिसमें सावित्री द्वारा यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाने की प्रेरणादायक गाथा का उल्लेख किया गया। यह कथा नारी शक्ति, संकल्प और पति-पत्नी के अटूट बंधन का प्रतीक मानी जाती है। वट वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूत बांधती महिलाओं ने पारंपरिक मंगल गीत गाए और पति की दीर्घायु, वैवाहिक सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। यह सूत पति-पत्नी के सात जन्मों के अटूट संबंध का प्रतीक माना जाता है।
कटिहार ही नहीं, भागलपुर, पटना के दानापुर सहित बिहार के अन्य जिलों में भी यह पर्व पूरी श्रद्धा से मनाया गया। देश के अन्य हिस्सों—उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उड़ीसा—में भी यह पर्व ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाया गया। जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में इसे 15 दिन बाद, ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को मनाने की परंपरा है।
ऐसी मान्यता है कि वट वृक्ष में सभी देवताओं का वास होता है और इसी वृक्ष के नीचे सावित्री ने कठोर तप कर अपने पति को पुनर्जीवन दिलाया था। यही कारण है कि यह वृक्ष सुहाग की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। पूरे आयोजन में महिलाओं की आस्था, भक्ति और पारिवारिक समर्पण की झलक