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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रचंड जीत के बाद पटना में हुई पार्टी विधायक दल की बैठक में एक बार फिर सम्राट चौधरी को विधायक दल का नेता और विजय कुमार सिन्हा को उपनेता चुना गया है। इस फैसले ने दोनों नेताओं के दोबारा उपमुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ कर दिया है। यह निर्णय न केवल बिहार में बीजेपी के आंतरिक संतुलन को दर्शाता है, बल्कि इसके पीछे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक गहरी और दूरगामी रणनीति काम कर रही है, जिसका सीधा लक्ष्य 2029 के लोकसभा चुनाव तक बिहार में पार्टी के जनाधार को अभेद्य बनाना है।
इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि भारी संख्या में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और राजपूत विधायकों के चुनकर आने के बावजूद बीजेपी ने क्यों अपनी पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए कुशवाहा जाति से आने वाले सम्राट चौधरी और भूमिहार जाति से आने वाले विजय सिन्हा पर दोबारा दांव लगाया।
अमित शाह की रणनीतिक सोच: ‘विनिंग कॉम्बिनेशन’ पर भरोसा
सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा को बरकरार रखने का निर्णय पूरी तरह से बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व, विशेष रूप से ‘पार्टी के चाणक्य’ माने जाने वाले अमित शाह की सोच का परिणाम माना जा रहा है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख तर्क काम कर रहे हैं:
निरंतरता और स्थिरता : सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा ने विपक्ष में रहते हुए आक्रामक भूमिका निभाई और फिर एनडीए की सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में सफल कार्य किया। उनकी जोड़ी ने संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बिठाते हुए एनडीए को एक बड़ी जीत दिलाई। अमित शाह ने इस ‘विनिंग कॉम्बिनेशन’ को बदलने का कोई जोखिम नहीं लिया, ताकि संगठन और सरकार में किसी भी तरह की अस्थिरता या असंतोष पैदा न हो।
संगठन पर मजबूत पकड़: दोनों ही नेताओं की पार्टी के संगठन पर मजबूत पकड़ है, जो अगले पाँच सालों के लिए एनडीए सरकार के लिए स्थिरता सुनिश्चित करेगी।
जातिगत संतुलन का मास्टरस्ट्रोक: सवर्ण प्लस ओबीसी
सम्राट चौधरी (कुशवाहा/ओबीसी): सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने बिहार की राजनीति में एक मजबूत ओबीसी नेता को शीर्ष पर रखा है। कुशवाहा जाति बिहार में यादवों के बाद सबसे बड़ी ओबीसी जातियों में से एक है, और यह वर्ग पारंपरिक रूप से नीतीश कुमार के वोटबैंक का हिस्सा रहा है। सम्राट को आगे रखकर बीजेपी इस कुशवाहा-कोइरी वोटबैंक को स्थायी रूप से अपने साथ जोड़ना चाहती है। इससे EBC के बीच भी यह संदेश जाता है कि ओबीसी वर्ग को उच्च प्रतिनिधित्व मिल रहा है।
विजय सिन्हा (भूमिहार/सवर्ण): विजय सिन्हा को बनाए रखकर पार्टी ने अपने पारंपरिक सवर्ण वोटबैंक (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण) को स्पष्ट संदेश दिया है कि उनका प्रतिनिधित्व शीर्ष पर बरकरार है। भूमिहार समुदाय ने बीजेपी के लिए हमेशा कठिन समय में भी मजबूत वोटिंग की है। सिन्हा की वापसी से यह वर्ग संतुष्ट रहेगा और 2029 तक पार्टी के साथ मजबूती से जुड़ा रहेगा।
यह कोइरी-भूमिहार की जोड़ी बीजेपी को सिर्फ एक जाति तक सीमित होने से रोकती है और राज्य के जटिल जातिगत समीकरणों में एक व्यापक सामाजिक आधार प्रदान करती है। अमित शाह की यह रणनीति सिर्फ आज की जीत नहीं, बल्कि आने वाले 2029 के चुनाव की नींव तैयार करने पर केंद्रित है।