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बिहार के जिला खनन कार्यालयों में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार की जड़ों को काटने के लिए खान एवं भू-तत्व विभाग ने एक बड़ा प्रशासनिक निर्णय लिया है। विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब “कुर्सी से चिपके” डाटा एंट्री ऑपरेटरों की मनमानी नहीं चलेगी। नई अनिवार्य स्थानांतरण नीति के तहत, मार्च 2026 के बाद कोई भी ऑपरेटर एक ही जिले या कार्यालय में लंबी अवधि तक तैनात नहीं रह सकेगा।
भ्रष्टाचार और ‘एकाधिकार’ पर प्रहार
विभागीय जांच और समय-समय पर मिलने वाली शिकायतों में यह बात सामने आई है कि जिला खनन कार्यालयों में कई डाटा एंट्री ऑपरेटर 3 से 5 साल या उससे भी अधिक समय से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। लंबे समय तक एक ही पद पर बने रहने के कारण इन कर्मियों का संवेदनशील डेटा, माइनिंग चालान और विभागीय प्रक्रियाओं पर अत्यधिक नियंत्रण हो जाता है। विभाग का मानना है कि यह स्थिति न केवल अनियमितताओं को जन्म देती है, बल्कि भ्रष्टाचार और बिचौलियों के गठजोड़ को भी बढ़ावा देती है। नियमित तबादलों से इस ‘एकाधिकार’ को खत्म किया जा सकेगा।
जिलों से मांगी गई ‘लंबी सेवा’ वाले कर्मियों की सूची
विभागीय निर्देशों के अनुसार, इस नई नीति को धरातल पर उतारने के लिए सभी जिला खनन अधिकारियों से उन कर्मियों की विस्तृत सूची मांगी गई है जो एक ही स्थान पर 3 से 5 वर्ष या उससे अधिक समय की सेवा पूरी कर चुके हैं अथवा जिनके विरुद्ध पूर्व में शिकायतें प्राप्त हुई हैं।
मार्च 2026 से दिखेगा असर
खान एवं भू-तत्व विभाग के अनुसार, वर्तमान में सूची तैयार करने और नीति को अंतिम रूप देने का काम चल रहा है। मार्च 2026 की समय सीमा इसलिए तय की गई है ताकि वित्तीय वर्ष की समाप्ति के साथ ही स्थानांतरण की प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से पूरा किया जा सके। अधिकारियों का दावा है कि इस कदम से न केवल कामकाज में तेजी आएगी, बल्कि अवैध खनन और राजस्व की चोरी रोकने में भी मदद मिलेगी।