बिहार में राज्यसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन के भीतर मची हलचल को एक नए नजरिए से देखा जा सकता है। विधायकों की गैरमौजूदगी के पीछे केवल राजनीतिक असंतोष ही नहीं, बल्कि कानूनी और व्यक्तिगत मजबूरियों का एक जटिल जाल नजर आता है। बिहार राज्यसभा चुनाव में राजद उम्मीदवार एडी सिंह के पक्ष में मतदान न करने वाले चार विधायकों (3 कांग्रेस, 1 राजद) ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। जहाँ आधिकारिक तौर पर अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं, वहीं पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही संकेत देती है।
विधायकों के आधिकारिक तर्क बनाम जमीनी हकीकत;
| विधायक का नाम | पार्टी | दिया गया तर्क | संभावित वास्तविक कारण |
| फैसल रहमान | RJD | माता की बीमारी | अदालती केस और पुराना आपराधिक रिकॉर्ड |
| मनोज विश्वास | कांग्रेस | गठबंधन में तालमेल की कमी | जीत का बेहद कम अंतर और हाई कोर्ट में लंबित मामला |
| मनोहर प्रसाद | कांग्रेस | नेतृत्व का स्पष्ट निर्देश न होना | राजनीतिक दबाव |
| सुरेंद्र कुशवाहा | कांग्रेस | व्यक्तिगत कारण | राजनीतिक समीकरण |
सदस्यता जाने का डर;
सियासी जानकारों का मानना है कि मनोज विश्वास (फारबिसगंज) और फैजल रहमान (ढाका) की अनुपस्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण पटना हाई कोर्ट में चल रहे चुनावी मामले हैं। मनोज विश्वास महज 221 वोट और फैजल रहमान सिर्फ 178 वोट से जीते थे। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि इन सीटों पर मृत या राज्य से बाहर रहने वाले लोगों के नाम पर वोट डाले गए। यदि हाई कोर्ट में यह साबित हो जाता है, तो इन दोनों की विधायिका रद्द हो सकती है। माना जा रहा है कि सत्ता पक्ष के साथ किसी भी टकराव से बचने और अपने केस को कमजोर होने से बचाने के लिए इन विधायकों ने वोटिंग से दूरी बनाना ही बेहतर समझा।
आपराधिक मामलों का साया;
विधायक फैजल रहमान का अतीत भी उनकी अनुपस्थिति का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। 2007 का गुवाहाटी कांड याद ही होगा कि वो एक होटल व्यवसायी की हत्या में फैजल रहमान का नाम सुपारी देने के आरोपी के तौर पर उछला था। हालांकि, यह मामला फिलहाल ‘ठंडे बस्ते’ में है, लेकिन सत्ता के समीकरण बदलने पर ऐसी फाइलें दोबारा खुलने का डर हमेशा बना रहता है। मनोज विश्वास पर भी दो आपराधिक मामले दर्ज हैं।
जातीय और आंतरिक राजनीति;
कुछ विधायकों ने यह तर्क भी गढ़ा कि उम्मीदवार एडी सिंह की जातीय पृष्ठभूमि (भूमिहार) उन्हें रास नहीं आई। वहीं, कांग्रेस विधायकों ने प्रदेश अध्यक्ष के ढुलमुल रवैये को अपनी अनुपस्थिति का ढाल बनाया। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये तर्क केवल अपनी पार्टी और जनता की नाराजगी से बचने का एक ‘सेफ एग्जिट’ प्लान मात्र हैं।