बिहार की सियासत में 21 साल बाद एक बहुत बड़ा ‘पावर शिफ्ट’ होने जा रहा है। 1990 से 2005 तक लालू यादव के ‘राज’ और फिर 2005 से अब तक (कुछ महीनों को छोड़कर) नीतीश कुमार के ‘शासन’ के बाद, अब पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) बिहार की कमान अपने हाथ में लेने की तैयारी कर चुकी है। 16 मार्च 2026 को नीतीश कुमार का राज्यसभा सांसद चुना जाना महज एक पद का बदलाव नहीं, बल्कि बिहार की सत्ता के हस्तांतरण की सोची-समझी स्क्रिप्ट का हिस्सा है। आइए समझते हैं कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति का ऊँट किस करवट बैठने वाला है।
बिहार में पहली बार ‘भाजपा का मुख्यमंत्री’;
पिछले एक दशक से सत्ता की दहलीज पर खड़ी BJP अब “बड़े भाई” की भूमिका में है। जेडीयू और बीजेपी के बीच यह सहमति बन चुकी है कि अगला मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। हालांकि, इस चयन में नीतीश कुमार की रजामंदी अनिवार्य है क्योंकि गठबंधन को साथ लेकर चलना और जातीय समीकरणों को साधना सबसे बड़ी चुनौती है।

कौन बनेगा मुख्यमंत्री? रेस में शामिल 5 बड़े चेहरे
1) सम्राट चौधरी: सबसे प्रबल दावेदार
– सम्राट चौधरी फिलहाल रेस में सबसे आगे हैं। नीतीश कुमार का हालिया सार्वजनिक व्यवहार (कंधे पर हाथ रखना और तारीफ करना) उनके नाम पर मुहर लगाता दिख रहा है। उनकी ताकत है कि कुशवाहा समाज (लव-कुश समीकरण) से आते हैं। लालू यादव के खिलाफ बेहद आक्रामक हैं और उनके पास मंत्री व डिप्टी सीएम का लंबा अनुभव है। कमजोरी ये भी है कि वे मूल भाजपाई नहीं हैं; आरजेडी और जेडीयू से आए हैं, जिससे पार्टी के पुराने धड़े में थोड़ी नाराजगी रहती है।

2) संजीव चौरसिया: संघ का ‘ट्रंप कार्ड’
– अगर भाजपा किसी चौंकाने वाले नाम पर दांव खेलती है, तो वह संजीव चौरसिया हो सकते हैं। उनकी ताकत है कि वो 36% ईबीसी (अति पिछड़ा) वोट बैंक का प्रतिनिधित्व करते हैं। आरएसएस का मजबूत बैकग्राउंड और साफ-सुथरी छवि के लिए जाने जाते हैं। कमजोरी है कि उन्हें प्रशासनिक अनुभव की कमी है और वे कभी मंत्री नहीं रहे हैं।

3) नित्यानंद राय: शाह के भरोसेमंद
– उनकी ताकत है कि वो यादव समाज से आते हैं। अमित शाह के बेहद करीबी और केंद्र में गृह राज्य मंत्री हैं। कमजोरी ये है कि भाजपा का बिहार में मुख्य फोकस ‘गैर-यादव ओबीसी’ पर रहा है। यादव सीएम बनाने से अन्य जातियां छिटक सकती हैं।

4) दिलीप जायसवाल: संगठन के खिलाड़ी
– उनकी ताकत है कि वे वैश्य समाज (बीजेपी का कोर वोटर) से आते हैं। वो शांत स्वभाव और कुशल चुनाव रणनीतिकार भी हैं। कमजोरी ये है कि वे बहुत ज्यादा आक्रामक नहीं हैं, जबकि बिहार की राजनीति में फिलहाल ‘फायरब्रांड’ छवि की मांग है।

5) विजय सिन्हा: अनुभवी और सख्त
– उनकी ताकत है कि स्पीकर और डिप्टी सीएम रह चुके हैं। प्रशासन पर मजबूत पकड़ और संघ के पुराने सिपाही माने जाते है। कमजोरी है कि वो सवर्ण (भूमिहार) है। बिहार की पिछड़ा-आधारित राजनीति में सवर्ण सीएम बनाना भाजपा के लिए एक बड़ा रिस्क हो सकता है।

नीतीश कुमार का ‘प्लान बी’: निशांत की एंट्री
नीतीश कुमार राजनीति से पूरी तरह विदा नहीं हो रहे हैं। चर्चा है कि सत्ता के इस नए ढांचे में उनके बेटे निशांत कुमार की आधिकारिक एंट्री होगी। उन्हें डिप्टी सीएम का पद दिया जा सकता है, ताकि जेडीयू का वजूद और नीतीश की विरासत सरकार में बनी रहे। उनके साथ अनुभवी विजय चौधरी को भी डिप्टी सीएम बनाकर संतुलन साधा जा सकता है।