चाणक्य की नई चाल: अमित शाह की मौजूदगी में नीतीश ने भरा राज्यसभा का पर्चा, बिहार में नए युग का आगाज…

Ritu Raj

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरे अध्यायों में से एक है। छात्र राजनीति की तपिश से निकलकर अब राज्यसभा की दहलीज तक पहुंचने वाले नीतीश कुमार ने सत्ता के गलियारों में जो ‘इंजीनियरिंग’ की है, वह विरली ही देखने को मिलती है। नीतीश कुमार केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के वह धुरी रहे हैं जिसके इर्द-गिर्द पिछले दो दशकों की सत्ता घूमती रही है। उनका यह सफर तीन प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है:

शुरुआती संघर्ष और विधायी शुरुआत;
नीतीश कुमार की राजनीतिक जड़ें जेपी आंदोलन के छात्र नेतृत्व में गहरी जमी हैं। हालांकि, चुनावी राजनीति की शुरुआत आसान नहीं थी।
पहली चुनौती: 1977 में हरनौत से पहला चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा।
सफलता का उदय: 1985 में वे पहली बार हरनौत से विधायक चुनकर बिहार विधानसभा पहुंचे।

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केंद्र की राजनीति और ‘रेल’ की रफ़्तार;
1989 में बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से जीतकर उन्होंने दिल्ली का रुख किया।
सांसदों का सफर: वे 1989 से 1999 के बीच लगातार बाढ़ संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। 2004 में उन्होंने नालंदा का रुख किया और वहां से भी विजयी हुए।
केंद्रीय भूमिका: अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उन्होंने कृषि और रेल जैसे भारी-भरकम मंत्रालयों को संभाला, जहाँ उनके प्रशासनिक कौशल की काफी सराहना हुई।

बिहार के ‘मुख्यमंत्री’ और गठबंधन के प्रयोग;
बिहार में नीतीश युग की वास्तविक शुरुआत 2005 से मानी जाती है, हालांकि 2000 में वे मात्र 7 दिनों के लिए भी मुख्यमंत्री बने थे।
रिकॉर्ड पारी: 2005 के बाद से वे 2010, 2015, 2020 और 2025 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रहे।
वैचारिक लचीलापन: उन्होंने सत्ता के लिए कभी एनडीए (NDA) तो कभी राजद (RJD) के साथ गठबंधन किया, जिससे उन्हें ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और ‘गठबंधन की राजनीति’ का माहिर खिलाड़ी माना जाने लगा।

एक दुर्लभ उपलब्धि;
भारतीय राजनीति में ऐसे बहुत कम नेता हैं जिन्हें चारों विधायी सदनों का अनुभव हो। नीतीश कुमार अब इस सूची में शामिल होने जा रहे हैं:
विधानसभा: (पूर्व सदस्य)
लोकसभा: (पूर्व सांसद)
विधान परिषद: (वर्तमान/पूर्व सदस्य)
राज्यसभा: (भावी सदस्य)

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