चनपटिया विधानसभा: कभी कांग्रेस का गढ़, अब भाजपा का ‘अभेद किला’; ब्राह्मण-यादव बहुल इस सीट पर 6 बार से जारी है कमल का कब्जा

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के मद्देनजर पश्चिमी चंपारण लोकसभा क्षेत्र की चनपटिया विधानसभा सीट चर्चा का केंद्र बनी हुई है। इस सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है, जो बताता है कि कैसे एक दौर में कांग्रेस और सीपीआई का गढ़ रहा यह क्षेत्र अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अभेद किला बन चुका है। साल 2000 से भाजपा ने इस सीट पर जीत का जो सिलसिला शुरू किया, वह लगातार छठी बार 2020 में भी जारी रहा।

सियासी समीकरण और वर्चस्व की कहानी

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चनपटिया विधानसभा सीट की राजनीति में ब्राह्मण और यादव मतदाताओं का वर्चस्व माना जाता है। इसके अलावा, मुस्लिम वोटरों की भी अच्छी संख्या है, जबकि भूमिहार और कोइरी मतदाता भी चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

इस सीट पर 1957 में कांग्रेस की केतकी देवी ने पहली जीत दर्ज की थी, जिसके बाद 1960 के दशक में भी कांग्रेस का दबदबा रहा। बाद के वर्षों में सीपीआई ने यहां से 1980, 1985 और 1995 में जीत हासिल की। हालांकि, वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कृष्ण कुमार मिश्र के साथ जो जीत हासिल की, उसके बाद से पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2020 के चुनाव में भी भाजपा के उमाकांत सिंह ने 13,469 वोटों के बड़े अंतर से कांग्रेस के अभिषेक रंजन को हराया, जिसने यह साबित कर दिया कि यह सीट अब पूरी तरह से भाजपा के पाले में है।

बंद चीनी मिल का दशकों पुराना मुद्दा

चनपटिया, जो एक कृषि आधारित क्षेत्र है, यहाँ के किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा बंद चीनी मिल है। 1994 में चीनी मिल के बंद हो जाने से गन्ना किसानों के सामने अपने गन्ने की आपूर्ति की बड़ी समस्या खड़ी हो गई, जो तीन दशकों बाद भी बरकरार है।

हर लोकसभा और विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दल इस मिल को चालू कराने का वादा करते हैं, लेकिन यह वादा आज तक पूरा नहीं हो सका है। हालांकि, हाल के दिनों में चनपटिया को औद्योगिक विस्तार देने के लिए सरकार द्वारा चनपटिया स्टार्टअप और कुमारबाग टेक्सटाइल पार्क जैसी पहल की गई हैं, लेकिन गन्ना किसानों की मूल समस्या और पीड़ा अभी भी खत्म नहीं हुई है, और यह आगामी चुनावों में एक ज्वलंत मुद्दा बनी रहेगी।

टक्कर का इतिहास: जब जदयू से जीती थी भाजपा

2015 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर भाजपा के प्रकाश राय और जदयू के एनएन शाही के बीच कड़ा मुकाबला हुआ था। उस समय भाजपा ने मात्र 464 वोटों के बेहद करीबी अंतर से जीत दर्ज की थी, जो सीट पर भाजपा के लिए अब तक की सबसे कमजोर जीत थी। लेकिन 2020 में उमाकांत सिंह ने जीत के अंतर को 13 हजार पार कर एक बार फिर भाजपा की मजबूत पकड़ को दर्शाया। 2020 में कांग्रेस ने भी जबरदस्त वापसी करते हुए 70 हजार से अधिक वोट हासिल किए थे, लेकिन वे भाजपा के विजय रथ को रोक नहीं पाए।

चनपटिया सीट पर कुल 2,91,944 मतदाता हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी चुनाव में भाजपा अपने लगातार सातवीं जीत दर्ज कर पाती है या विपक्ष, खासकर कांग्रेस या महागठबंधन, कोई नया समीकरण बनाकर इस ‘अभेद किले’ में सेंध लगा पाता है।

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