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बिहार विधानसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच, राज्य के विधायकों और जनता की आय के बीच की गहरी खाई एक बार फिर बहस का विषय बन गई है। एक ओर जहां बिहार देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाला राज्य बना हुआ है (मात्र 5,569 रुपये प्रति माह, राष्ट्रीय औसत 17,110 रुपये), वहीं दूसरी ओर विधायकों पर वेतन, भत्तों और सुविधाओं को मिलाकर लगभग तीन लाख रुपये प्रति माह खर्च हो रहा है।
जनप्रतिनिधियों के वेतन-भत्तों में होने वाली लगातार वृद्धि, खासकर ऐसे राज्य में जहां अधिकांश नागरिक दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं, जनता को अखर रही है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के 80 प्रतिशत विधायक करोड़पति हैं, जिनमें सबसे अमीर विधायक की संपत्ति जनता की औसत संपत्ति से सौ गुना से भी अधिक है। मोकामा से जदयू उम्मीदवार अनंत सिंह ने हाल ही में 37.88 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की है, जो इस असमानता को और उजागर करती है।
वेतन और सुविधाओं में लगातार वृद्धि
लेख के अनुसार, सरकारी कर्मचारियों के वेतन में जहां महंगाई दर के अनुपात में वृद्धि नहीं होती, वहीं विधायकों और सांसदों के वेतन-भत्ते नियमित रूप से बढ़ते रहे हैं।
सांसदों को लाभ: 2024 में सांसदों के वेतन में 24 प्रतिशत की वृद्धि के बाद उन्हें प्रति माह 1.24 लाख रुपये वेतन मिल रहा है। भत्ता और सुविधाएं जोड़कर यह राशि लगभग 5 लाख रुपये तक पहुँच जाती है। एक सांसद की वार्षिक आय (30.48 लाख रुपये) देश के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय (2.05 लाख रुपये) से औसतन 15 गुना से अधिक है। सांसदों को मुफ्त चिकित्सा, आवास, 50,000 यूनिट मुफ्त बिजली, 4,000 किलोलीटर पानी जैसी कई अन्य सुविधाएँ मिलती हैं।
बिहार में विधायकों की आय: बिहार के विधायकों पर वेतन, भत्ता और मुफ्त आवास (पटना में) को मिलाकर लगभग 3 लाख रुपये प्रति माह खर्च होता है। हाल ही में 2025 में, चुनाव की घोषणा से पहले विधायकों और मंत्रियों के वेतन-भत्ते में वृद्धि की गई थी: वेतन 50,000 से 65,000 रुपये। क्षेत्रीय भत्ता 55,000 से 70,000 रुपये। दैनिक भत्ता 3,000 से 3,500 रुपये।
पेंशन और विधायक निधि का प्रभाव
लेख में एक महत्वपूर्ण घटना का भी जिक्र है जब नवंबर 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के बाद एक अधिनियम के तहत उन 70 लोगों को पूर्व विधायक का दर्जा दिया, जो फरवरी 2005 के चुनाव में जीतकर भी बिना शपथ लिए मात खा गए थे। इस निर्णय से उन्हें पेंशन और अन्य सुविधाएं मिलने लगीं।
इसके अलावा, विधायकों को विकास कार्यों (सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य) के लिए वार्षिक 4 करोड़ रुपये की विधायक निधि मिलती है। यह राशि सीधे उनकी कमाई का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसका उपयोग उनके निर्वाचन क्षेत्र में लोकप्रियता बढ़ाने में अप्रत्यक्ष रूप से मदद करता है।
राजनीतिक सुधार की मांग
आय की इस बड़ी असमानता को देखते हुए, एडीआर जैसे संगठन मांग कर रहे हैं कि विधायकों के वेतन-भत्तों के निर्धारण और समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र और पारदर्शी निकाय का गठन किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि जब आम जनता को पेट भरने के लिए पसीना बहाना पड़ता है, तो सांसद-विधायक खुद ही अपना वेतन-भत्ता बढ़ाने के लिए विधेयक पारित कर लेते हैं।
लेख सुझाव देता है कि सरकार को इस असमानता को कम करने के लिए प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो औद्योगिक निवेश और कौशल विकास के माध्यम से संभव है। यूके (ब्रिटेन) की व्यवस्था अनुकरणीय हो सकती है, जहां एक आयोग यह सुनिश्चित करता है कि सांसदों का वेतन न इतना अधिक हो कि लोग इसे केवल करियर बनाने का प्रयास करें, और न इतना कम कि उनके कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा आए।