बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का नतीजा ठीक उसी राजनीतिक पैटर्न को दोहराता दिखा, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था। सीटों की संख्या भले NDA के पक्ष में भारी दिखाई दे रही हो, लेकिन जनाधार का गणित बताता है कि मुकाबला पहले जितना ही कड़ा है। आरजेडी 23% वोट शेयर के साथ फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि NDA ने इस बार 46.56% वोट हासिल किए, जो 2020 के 37.26% की तुलना में बड़ा उछाल है। ऐसे में यह कहना गलत होगा कि महागठबंधन का सफाया हो गया या किसी ‘SIR’ प्रभाव या वोट चोरी ने तस्वीर बदली। असल खेल वोटों के बंटवारे और रणनीति का रहा, न कि जनाधार के खत्म होने का।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का सबसे बड़ा संकेत यही है कि महागठबंधन का जनाधार पिछले चुनाव की तुलना में लगभग जस का तस बना रहा। 2025 में उसे 37.73% वोट मिले, जबकि 2020 में भी उसका वोट प्रतिशत 37.23% था। यानी न तो वह नए वोटरों को जोड़ पाई, न ही अपने आधार में कोई बड़ी बढ़ोतरी कर पाई। लोकसभा और विधानसभा, दोनों चुनावों में उसका प्रदर्शन एक ही पैटर्न पर चला। इसके उलट, ‘अन्य’ दलों का वोट शेयर 2020 के 25.51% से घटकर 2025 में सिर्फ 15.71% रह गया जो करीब 10% वोटों का यह खिसकाव सीधे NDA की झोली में गया और यही बदलाव पूरे चुनावी परिणामों को उलटने के लिए काफी साबित हुआ। NDA का वोट शेयर 3.3% बढ़ा, जिसकी वजह सरकार के कामकाज से बनी संतुष्टि, बिजली–पानी–सड़क–अस्पताल जैसे बुनियादी क्षेत्रों में दिखा सुधार और वेलफेयर स्कीम्स का असर रहा। साथ ही यह धारणा भी काम आई कि जब केंद्र में NDA की सरकार है, तो राज्य में भी उसी गठबंधन की सरकार रहने से फायदा मिलेगा। वहीं, लेकिन NDA को मिले प्रचंड बहुमत के पीछे सबसे निर्णायक कारक यह रहा कि पिछले चुनाव में ‘अन्य’ दलों को वोट देने वाले बड़ी संख्या में मतदाता इस बार जंगलराज की आशंका से डरकर NDA के पक्ष में एकजुट हो गए। इसी गोलबंदी का सीधा परिणाम यह निकला कि जन सुराज का खाता नहीं खुल पाया और न ही कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत सका।
हालांकि, तेजस्वी यादव के लिए तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है क्योंकि उनका कोर वोट बैंक अभी भी मजबूत और पूरी तरह सुरक्षित है। यही वजह है कि अगर वे अगले चुनाव तक अपने हिस्से में 7 से 10 प्रतिशत नए वोट जोड़ने में कामयाब हो गए, तो बिहार की राजनीति में खेल पूरी तरह बदल सकता है। इसके लिए सबसे पहले उन्हें अपने उग्र और हुड़दंगी समर्थकों पर सख्त लगाम लगानी होगी, ताकि उनके खिलाफ बन रहा नकारात्मक माहौल नियंत्रित हो सके। साथ ही उन्हें अति-पिछड़ों और उन समुदायों के बीच भरोसा पैदा करना होगा जिन्हें लगता है कि उनकी सरकार में वे असहज हो सकते हैं। जैसे ही तेजस्वी इस परसेप्शन की दीवार तोड़ पाएंगे, उनके लिए सत्ता का रास्ता एक बार फिर खुल सकता है।