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पटना : सब कह रहे थे कि एआईएमआईएम सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी सीमांचल में एक बार फिर तेजस्वी यादव की मुश्किलें बढ़ाने आ रहे हैं, लेकिन राजद के रणनीतिकार अचानक से आवाक रह गए हैं। सीमांचल भूल जाइए, तेजस्वी यादव के लिए असली मुसीबत तो ओवैसी मिथिलांचल और छपरा में खड़ी करने जा रहे हैं। बात यहीं खत्म नहीं होने जा रही। रविवार 4 मई को ही ओवैसी गोपालगंज भी जाएंगे। तो इसे गहराई से समझिए। ओवैसी शुरुआत सीमांचल से कर रहे हैं, लेकिन उनकी अगली दस्तक मिथिलांचल और सारण में होने जा रही हैं। मतलब बिलकुल साफ़ है कि ओवैसी की कोशिश विधानसभा चुनाव के लिए नए इलाकों में दस्तक देने की है। मिथिलांचल के खेल में पहले से ही राष्ट्रीय जनता दल उलझ जाता है, अब अगर यहां ओवैसी फ़ैक्टर चलेगा, ओवैसी अपनी गतिविधि तेज़ करेंगे, तो इससे सीधे-सीधे राजद को ही घाटा होगा। राजनीतिक पंडितों की मानें, तो पिछली बार सिर्फ़ और सिर्फ़ ओवैसी फ़ैक्टर की वजह से तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे। ओवैसी ने सीमांचल की सिर्फ़ पांच सीटें नहीं उड़ाई थी, बल्कि कई सीटों पर महागठबंधन की हार की बड़ी वजह बन गए थे और इस बार तो ओवैसी 50 सीटों का प्लान लेकर बिहार में उतरे हैं। मतलब वैसी पचास सीटें जिसे आरजेडी और कांग्रेस आसान समझ रही थी, अब ओवैसी की दस्तक उन सीटों को मुश्किल बना देगी। ओवैसी चार मई को मोतिहारी के ढाका और गोपालगंज में मीटिंग करेंगे। दरअसल, ओवैसी बिहार के नए इलाकों में अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। इन इलाकों में अबतक ओवैसी कोई फ़ैक्टर नहीं रहे हैं, लेकिन इस बार ओवैसी की कोशिश इन इलाकों में अपना जादू दिखाने की है। दरअसल, हैदराबाद में बैठकर ओवैसी ने बिहार की एक-एक सीट पर गहराई से रिसर्च किया है और एआईएमआईएम के सूत्रों के मुताबिक ओवैसी ने मिथिलांचल और सारण की उन सीटों को चिह्नित किया है जहां मुस्लिम वोटर्स बड़ी संख्या में हैं। औवैसी और उनकी पार्टी इन सीटों पर इस बार खूब पसीना बहाएंगे। हालांकि, ऐसा नहीं है कि ओवैसी के लिए रास्ता बहुत आसान है। सीवान में पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के परिवार और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के परिवार के बीच एक समय चौड़ी हो चुकी खाई अब भर चुकी है। दोनों परिवारों ने हाथ मिला लिया है। ऐसे में ओवैसी के लिए सारण में अपनी मज़बूती पेश करना आसान नहीं होगा, लेकिन छपरा, गोपालगंज, और सीवान के इलाके की विधानसभा सीटों पर अगर ओवैसी की पार्टी अपने उम्मीदवार उतारती है, तो इससे समीकरण तो ज़रूर बने-बिगड़ेगा। दरअसल, ओवैसी चाहते हैं कि बिहार में मुस्लिम वोट बैंक पर जिस तरह से राजद का एकाधिकार है, उसे खत्म कर दिया जाए। इसलिए ओवैसी लगातार यह पूछते हैं कि लालू परिवार ने मुसलमानों के लिए क्या किया। मुसलमानों की लीडरशिप को आगे क्यों नहीं बढ़ाया। इतने कम मुसलमान विधायकों को मंत्री क्यों बनाया और कभी भी मुस्लिम मंत्रियों को अहम विभाग क्यों नहीं दिए। दूसरी तरफ़ आरजेडी और कांग्रेस ओवैसी की पार्टी को बीजेपी की बी टीम बताती रही है, अब देखिए बिहार के अल्पसंख्यक किस पर भरोसा करते हैं।
सब सीमांचल-सीमांचल चिल्लाते रहे असदुद्दीन ओवैसी की नज़र तो यहां है!