सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में चुनावी साल जैसे-जैसे करीब आ रहा है, राज्य की राजनीति गर्माती जा रही है। ताज़ा मामला है राज्य सरकार द्वारा लगातार नए आयोगों और परिषदों के गठन का। बीती रात सरकार ने तीन नए आयोगों — बिहार नागरिक परिषद, बिहार उद्यमी एवं व्यवसाय आयोग, और एक अन्य आयोग का गठन कर अधिसूचना जारी कर दी। इससे विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच जुबानी जंग और तीखी हो गई है।
तेजस्वी यादव, राजद नेता, इस पूरे मुद्दे पर लगातार सरकार पर निशाना साध रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार खजाना लूटने के लिए आयोगों का गठन कर रही है। राजद के मुख्य प्रवक्ता शक्ति यादव ने तीखा तंज कसते हुए कहा, “यह नेशनल दामाद आयोग का युग है, सत्ता की भुजा पार्टी अपने किराएदारों को स्थापित करने में लगी है।”
कांग्रेस प्रवक्ता आनंद माधव ने भी सरकार पर हमला बोला और कहा कि, “चुनाव से ऐन पहले आयोगों की बाढ़ आई है, यह जनता के पैसे की खुली लूट है। अगर जरूरत थी, तो आयोग वर्षों से खाली क्यों पड़े थे?”
वहीं भाजपा और जेडीयू ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और कार्यकर्ताओं को सम्मान देने की पहल बताया है। भाजपा प्रवक्ता अरविंद सिंह ने कहा, “राजद को इसलिए तकलीफ हो रही है क्योंकि अब सत्ता सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रह गई। आम कार्यकर्ता को भी भागीदारी मिल रही है।”
जेडीयू प्रवक्ता अभिषेक झा ने भी पलटवार करते हुए कहा, “विपक्ष तब हंगामा करता था जब आयोग नहीं बनते थे, अब जब सरकार संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आयोग बना रही है, तब भी विरोध हो रहा है।”
इन तीखे बयानों के बीच सवाल यह है कि आयोगों का यह सिलसिला कहीं राजनीतिक नियुक्तियों और चुनावी तैयारी का हिस्सा तो नहीं है? क्योंकि नियुक्त किए गए सदस्यों को वेतन, सुरक्षा, सुविधाएं दी जाएंगी, जो सीधा राज्य के खजाने पर बोझ डालेगा। अब यह साफ है कि आयोगों का यह मुद्दा चुनावी रणभूमि में एक बड़ा सियासी हथियार बनने जा रहा है। विपक्ष इसे भ्रष्टाचार और लूट की संज्ञा दे रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे लोकतंत्र का विस्तार बता रहा है।