उम्मीद से उम्मीदवारी तक: बिहार में महिलाओं की सियासी उड़ान…

Ritu Raj

बिहार की सियासत में महिलाओं की मौजूदगी अब सिर्फ़ तालियों तक सीमित नहीं रही। कभी पुरुष नेताओं की रैलियों में दर्शक बनीं महिलाएं अब खुद मंच संभाल रही हैं, माइक थामकर जनता से वोट मांग रही हैं। 2010 से 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि मतदान में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं, लेकिन टिकट वितरण में अब भी पिछली कतार में खड़ी हैं। सवाल उठता है कि क्या बिहार की राजनीति में महिलाओं को बराबरी का हक कब मिलेगा?

2010: एक मामूली शुरुआत, बड़ी निराशा
साल 2010 में कुल 214 महिला उम्मीदवार मैदान में उतरी थीं। उस समय कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 32 महिलाओं को टिकट दिए थे, लेकिन दुर्भाग्य से एक भी जीत नहीं सकीं। वहीं जेडीयू ने 23, बीजेपी ने 12 और आरजेडी ने 11 महिला उम्मीदवार उतारे थे। इस बार महिलाओं ने बड़ा असर छोड़ा है। वहीं, जेडीयू की 21 महिलाएं, बीजेपी की 10 और एक निर्दलीय उम्मीदवार विधानसभा पहुंचीं। यानी महिलाओं की जीत दर भले कम थी (कुल उम्मीदवारों का करीब 15% जीत), लेकिन यह शुरुआत बड़ी उम्मीद वाली थी। यह दौर बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का था, जहां महिलाओं को आरक्षण और सशक्तिकरण की नीतियां तो थीं, लेकिन चुनावी टिकट में पुरुष-प्रधान सोच हावी रही है।
2015: संख्या में उछाल, मौजूदगी में मजबूती
2015 आते-आते महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़कर 272 हो गई। इस बार जेडीयू, आरजेडी और बीजेपी तीनों ने महिलाओं पर भरोसा दिखाया। जेडीयू और आरजेडी ने 10-10, बीजेपी ने 14 महिलाओं को टिकट दिए। इसमें कुल 28 महिलाएं विधानसभा पहुंचीं। इनमें जेडीयू की 9, आरजेडी की 10, बीजेपी की 4, कांग्रेस की 4 और एक निर्दलीय थीं। महागठबंधन (जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस) की जीत में महिलाओं की भूमिका अहम रही, खासकर शराबबंदी जैसे मुद्दों पर फोकस किया। जीत दर में सुधार (करीब 10%) दिखा, जो दर्शाता है कि पार्टियां महिलाओं को रणनीतिक रूप से मैदान में उतार रही थीं।
2020: हिम्मत का इजाफा, लेकिन जीत में ठहराव
2020 में तस्वीर और दिलचस्प हुई है। इस साल 370 महिलाओं ने चुनावी मैदान में उतरने की हिम्मत दिखाई। जो 2010 की तुलना में करीब 73% ज्यादा है। लेकिन जीत का आंकड़ा ठहर गया कि सिर्फ 26 महिलाएं ही विधानसभा तक पहुंच सकीं। भाजपा ने इस साल 13 महिलाओं को टिकट दिए और उनमें से 9 ने जीत दर्ज की, यानी 69% सफलता दर, जो सबसे अधिक थी। आरजेडी की 23 में से 10 महिलाओं ने जीत दर्ज की, जबकि जेडीयू की सफलता दर 27% के आसपास रही। लेकिन आंकड़ों का गहराई बताता है कि महिलाओं को टिकट देने की दर में कई दलों ने कमी की। कांग्रेस और सीपीआई(एमएल) जैसी पार्टियों ने पिछली बार से कम महिलाओं को उतारा है। इनमें से कुल मिलाकर, महिलाओं की जीत दर घटकर 7% के आसपास रह गई, जो उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या के बावजूद निराशाजनक थी। कोविड महामारी और आर्थिक मुद्दों ने चुनाव को प्रभावित किया है, लेकिन महिलाओं की कम जीत दर पार्टियों की टिकट वितरण नीति पर सवाल उठाती है।
2025: बढ़ती आकांक्षाएं, घटती हिस्सेदारी
अब 2025 के बिहार चुनाव के मौजूदा दौर पर आते हैं। इस बार एनडीए की तरफ से 34 और महागठबंधन की तरफ से 30 महिलाएं मैदान में हैं। सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवार आरजेडी (23) ने उतारी हैं, उसके बाद जन सुराज पार्टी (25) और बसपा (26) हैं। लेकिन जेडीयू और बीजेपी जैसी प्रमुख पार्टियों ने महिला टिकटों में कमी की है। जेडीयू ने 13, बीजेपी ने भी 13 उम्मीदवारों को मौका दिया है। इसका मतलब साफ है कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के वादे तो खूब हुए, लेकिन हकीकत में कदम उतने तेज नहीं बढ़े। कुल महिला उम्मीदवारों की संख्या घटकर लगभग 258 रह गई है, जो 15 सालों में सबसे कम है। यह कमी पार्टियों के ‘विनेबिलिटी’ (जीत की संभावना) के बहाने को दर्शाती है, जहां महिलाओं को सुरक्षित सीटों पर भी कम प्राथमिकता मिली।

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दरअसल, ट्रेंड बताता है कि 15 सालों में महिला उम्मीदवारों की संख्या 214 से 370 तक बढ़ी, लेकिन सफलता दर लगभग 7% पर ही अटकी रही। यानी भागीदारी तो बढ़ी है, मगर जीत की राह अब भी कठिन है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार में महिला वोटरों की सक्रियता को देखते हुए दलों को अब टिकट बंटवारे की सोच बदलनी होगी। क्योंकि आंकड़े साफ कहते हैं कि वोट बैंक में महिलाएं आगे हैं, लेकिन सत्ता में अब भी पीछे ही हैं। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सराहनीय है, लेकिन जीत दर की कमी कई कारणों से जुड़ी है। 2025 के आगामी चुनावों में महिलाओं की भूमिका और मजबूत होने की उम्मीद है। पार्टियों को न केवल टिकट देना चाहिए, बल्कि सुरक्षित सीटों पर उतारना चाहिए। महिलाओं की यह यात्रा न केवल संख्याओं की है, बल्कि बिहार की लोकतांत्रिक समावेशिता की है।

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