बिहार चुनाव अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। पहले चरण के मतदान के बाद अब दूसरे चरण में मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है। मिथिलांचल से लेकर चंपारण तक सियासी हलचल तेज है, जहां दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर है और जनता विकास, जातीय समीकरणों व नए नेतृत्व की उम्मीदों के साथ अपना फैसला तैयार कर रही है। इस बार की जंग सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि विचारधारा और भरोसे की भी है।
दूसरे चरण में दिग्गज राज्य के कई हाई-प्रोफाइल विधानसभा क्षेत्रों पर सबकी नजरें टिकी हैं। सुपौल से जदयू के वरिष्ठ नेता और मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव अपने विकास कार्यों और संगठनात्मक मजबूती के सहारे मैदान में हैं, वहीं झंझारपुर से भाजपा के नीतीश मिश्र अपनी पारंपरिक पकड़ और क्षेत्रीय नेटवर्क पर भरोसा जता रहे हैं। वहीं, चकाई से निर्दलीय विधायक सुमित कुमार सिंह, अमरपुर से जदयू के जयंत राज और छातापुर से भाजपा के नीरज कुमार सिंह बबलू भी अपनी व्यक्तिगत छवि और जनता से सीधा जुड़ाव बनाए रखने की कोशिश में जुटे हैं। महिला नेताओं में भी मुकाबला दिलचस्प बना हुआ है। बेतिया से भाजपा की वरिष्ठ नेता रेणु देवी और धमदाहा से जदयू की लेशी सिंह महिला मतदाताओं को साधने की रणनीति पर फोकस कर रही हैं। इधर, हरसिद्धि से भाजपा के कृष्णनंदन पासवान और चैनपुर से बसपा के जमा खान अपने सामाजिक समीकरणों और स्थानीय नेटवर्क को मजबूत करने में जुटे हैं। दूसरे चरण का यह चुनाव न केवल दलों के गठजोड़ की ताकत की परीक्षा है, बल्कि कई दिग्गज नेताओं के राजनीतिक भविष्य का भी निर्धारण करेगा।
दूसरे चरण में एनडीए और महागठबंधन दोनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। एनडीए की ओर से सीटों का बंटवारा रणनीतिक रूप से किया गया है। भाजपा 52, जदयू 45, जपा (रा) 15, हम 6 और रालोमो 4 सीटों पर मैदान में है। वहीं, महागठबंधन ने जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए राजद को सबसे बड़ी 70 सीटें, कांग्रेस को 37, वीआईपी को 8, जबकि भाकपा माले, भाकपा और माकपा को क्रमशः 5, 4 और 2 सीटें देकर एक मजबूत वाम-लोकतांत्रिक गठजोड़ पेश करने की कोशिश की है। अब नजरें 11 नवंबर की वोटिंग पर टिकी हैं, जब मतदाता तय करेंगे कि बिहार की सियासत की दिशा किस ओर मुड़ेगी।