केंद्र की मोदी सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 2029 के लोकसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले धरातल पर उतारने के लिए एक नए संविधान संशोधन विधेयक पर विचार कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य कानून में शामिल ‘परिसीमन और नई जनगणना’ की अनिवार्य शर्त को सरल बनाना है।

क्या है सरकार का नया ‘प्लान-B’?
वर्तमान कानून के अनुसार आरक्षण नई जनगणना के बाद ही लागू हो सकता है, जिसमें 2027–28 तक का समय लगने की संभावना है। लेकिन इस देरी को खत्म करने के लिए सरकार दो बड़े कदम उठा सकती है। पहला, नई जनगणना का इंतज़ार करने के बजाय भारत की 2011 जनगणना के आंकड़ों को ही आधार बनाकर सीटों का निर्धारण करना, और दूसरा, दक्षिण भारतीय राज्यों की उस चिंता को दूर करने के लिए कि कम आबादी के कारण उनकी सीटें घट सकती हैं,।संसद और विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या में लगभग 50% की वृद्धि (यानी 1.5 गुना बढ़ोतरी) करना।
सीटों का गणित;
| विवरण | वर्तमान स्थिति | यदि सीटें नहीं बढ़ीं (33% कोटा) | यदि 50% सीटें बढ़ीं (कुल 815 सीटें) |
| कुल लोकसभा सीटें | 543 | 543 | 815 |
| महिला सांसद | 74 (लगभग) | 181 | 271 |
बिहार के राजनीतिक समीकरण पर प्रभाव;
सीटों में 50% की बढ़ोतरी होने पर बिहार के सदन की रूपरेखा काफी बदल जाएगी। इसमें लोकसभा में राज्य की सीटें 40 से बढ़कर 60 हो जाएंगी, जिनमें से 20 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। वहीं विधानसभा की सीटें वर्तमान 243 से बढ़कर 365 तक पहुंच सकती हैं, जिसमें 121 महिला विधायक सदन का हिस्सा बनेंगी। और इसका सीधा प्रभाव यह होगा कि बिहार में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या मौजूदा स्तर की तुलना में लगभग चार गुना तक बढ़ सकती है।
प्रमुख चुनौतियां और क्षेत्रीय चिंताएं;
विपक्ष और विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे तमिलनाडु और केरल का तर्क है कि परिसीमन के बाद यह स्थिति उन राज्यों के साथ “जनसंख्या नियंत्रण की सजा” जैसी होगी, जिन्होंने आबादी को नियंत्रित किया है, क्योंकि उनकी संसद में हिस्सेदारी कम हो सकती है; साथ ही वे यह भी कहते हैं कि उत्तर भारत में अधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण वहां की सीटें दक्षिण के मुकाबले ज्यादा बढ़ेंगी, जिससे “उत्तर बनाम दक्षिण” का राजनीतिक असंतुलन पैदा होने का खतरा है।

आरक्षण लागू होने की प्रक्रिया;
आरक्षण लागू होने की प्रक्रिया में रोटेशन और कोटा की स्पष्ट व्यवस्था हो सकती है, जिसके तहत आरक्षित सीटों का चयन लॉटरी सिस्टम से किया जाएगा। यानि कि हर चुनाव में इन सीटों का रोटेशन होगा ताकि पुरुष उम्मीदवारों के अवसर स्थायी रूप से समाप्त न हों। यह व्यवस्था प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिए लागू की जा सकती है, जिसे संसद आगे बढ़ा सकती है। और “कोटा के भीतर कोटा” के सिद्धांत के अनुसार, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं को उनके आरक्षित कोटे में से ही 33% हिस्सा मिलेगा। हालांकि अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए फिलहाल अलग से कोई प्रावधान नहीं है।

गौरतलब है कि यदि सरकार 2 अप्रैल तक चलने वाले इस बजट सत्र में संशोधन लाती है, तो भारत की लोकतांत्रिक संरचना में यह अब तक का सबसे बड़ा बदलाव होगा। इससे न केवल महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि एक जनप्रतिनिधि पर बढ़ते जनसंख्या के बोझ (जो अभी प्रति सांसद लगभग 25 लाख है) को भी कम किया जा सकेगा।