किंग महेंद्र: वो ‘धनकुबेर’ जिनके ‘प्रसाद’ से कांग्रेस, राजद और जदयू सबकी सियासी झोली भरी

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार की राजनीति में इन दिनों राज्यसभा के पूर्व सांसद दिवंगत महेंद्र प्रसाद, जिन्हें दुनिया ‘किंग महेंद्र’ के नाम से जानती है, एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। राजद एमएलसी सुनील सिंह द्वारा जदयू पर किंग महेंद्र से हर महीने 99 लाख रुपये चंदा लेने के आरोप ने सूबे की सियासत में उबाल ला दिया है। हालांकि, इतिहास के पन्ने पलटें तो साफ होता है कि किंग महेंद्र के ‘प्रसाद’ से न केवल जदयू, बल्कि कांग्रेस और खुद लालू यादव की राजद भी कभी अछूती नहीं रही।

जब जातीय दंगल पर भारी पड़ी ‘धन की धारा’
बिहार की राजनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय सन 2000 के आसपास का है। यह वह दौर था जब बिहार में यादव और भूमिहार ब्राह्मणों के बीच वर्चस्व की जंग अपने चरम पर थी। लक्ष्मणपुर बाथे और सेनारी जैसे भीषण नरसंहारों ने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया था। एक तरफ लालू यादव की राजनीतिक जमीन भूमिहारों के विरोध के कारण खिसक रही थी, तो दूसरी तरफ भूमिहार समुदाय राबड़ी सरकार से बेहद खफा था।

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हैरानी की बात यह है कि इस भीषण जातीय विद्वेष के बीच लालू यादव ने किंग महेंद्र (जो कि भूमिहार ब्राह्मण थे) को राजद के टिकट पर राज्यसभा भेजा। जानकारों का मानना है कि ‘धन की तेज धारा’ ने सारे जातीय मतभेदों को किनारे कर दिया। राजनीति का यह कड़वा सच एक बार फिर सामने आया कि दल चलाने के लिए सिद्धांतों से ज्यादा ‘धनकुबेर’ की जरूरत होती है।

उद्योगपति से ‘किंग’ बनने का सफर
जहानाबाद के एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे महेंद्र प्रसाद ने महज 31 साल की उम्र में अरिस्टो फार्मास्युटिकल्स जैसी दिग्गज कंपनी खड़ी की थी। 1980 के चुनाव में जब वे अपनी चमचमाती विदेशी कारों के काफिले और लंगर के साथ जहानाबाद पहुंचे, तो जनता ने उनकी शान-शौकत देख उन्हें ‘किंग महेंद्र’ की उपाधि दे दी।

हर दल के बने ‘माननीय’
किंग महेंद्र की राजनीतिक यात्रा किसी भी विचारधारा से परे केवल सत्ता और संसाधनों के इर्द-गिर्द घूमती रही:

कांग्रेस काल: 1980 में इंदिरा गांधी के करीबी माखनलाल फोतेदार उन्हें राजनीति में लाए। कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा और फिर बार-बार राज्यसभा भेजा।

राजद काल: कांग्रेस के कमजोर होने पर 1993 में लालू यादव ने उन्हें गले लगाया और 2000 में राजद से राज्यसभा भेजा।

जदयू काल: 2006 में जब नीतीश कुमार को पार्टी चलाने के लिए संसाधनों की जरूरत पड़ी, तो ललन सिंह के जरिए किंग महेंद्र को जदयू में शामिल किया गया।

किंग महेंद्र सात बार राज्यसभा सांसद रहे, जो भारतीय राजनीति में एक रिकॉर्ड है। आज उन पर लग रहे चंदे के आरोप महज एक राजनीतिक बयानबाजी हो सकते हैं, लेकिन यह सच है कि बिहार के हर बड़े राजनीतिक दल ने उनकी दौलत के ‘प्रसाद’ का स्वाद चखा है।

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