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बिहार की नीतीश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ते हुए गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों के लिए फरिश्ता बनकर सामने आई है। मुख्यमंत्री बाल थैलेसीमिया योजना के तहत मंगलवार, 13 जनवरी 2026 को सात बच्चों के एक नए बैच को बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) के लिए तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (CMC) रवाना किया गया। स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने इन बच्चों के सुरक्षित भविष्य की कामना करते हुए सरकार की इस जनकल्याणकारी योजना का विवरण साझा किया।
सात जिलों के बच्चों को मिला नया जीवन
इस सातवें बैच में बिहार के सात अलग-अलग जिलों के बच्चों को शामिल किया गया है। स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि इसमें मधुबनी, मुजफ्फरपुर, मधेपुरा, वैशाली, सीतामढ़ी, खगड़िया और पूर्वी चंपारण का एक-एक बच्चा शामिल है। ये सभी बच्चे ‘थैलेसीमिया मेजर’ जैसी गंभीर स्थिति से जूझ रहे थे। गौरतलब है कि इससे पहले भी विभिन्न चरणों में राज्य के 26 बच्चों का सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट कराया जा चुका है, जो अब एक सामान्य जीवन की ओर अग्रसर हैं।
प्रति मरीज 15 लाख रुपये का खर्च और निःशुल्क इलाज
मंगल पांडेय ने बताया कि राज्य सरकार थैलेसीमिया, हीमोफिलिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी बीमारियों के प्रति बेहद संवेदनशील है। मुख्यमंत्री बाल थैलेसीमिया योजना के तहत 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों का चयन किया जाता है। यदि बच्चे का एचएलए (HLA) उसके भाई या बहन से मैच कर जाता है, तो सरकार सीएमसी वेल्लोर में उसका पूर्णतः निःशुल्क बोन मैरो ट्रांसप्लांट करवाती है। इस पूरी प्रक्रिया पर प्रति मरीज लगभग 15 लाख रुपये का खर्च आता है, जिसका पूरा वहन बिहार सरकार करती है।
एकीकृत डे-केयर केंद्रों से मिल रही मदद
मरीजों की सुविधा के लिए राज्य में छह एकीकृत डे-केयर सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों पर ब्लड ट्रांसफ्यूजन, आयरन चेलेटिंग दवाएं और आवश्यक जांच की सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने दोहराया कि सरकार का लक्ष्य केवल इलाज करना नहीं, बल्कि प्रदेश के हर गरीब और बीमार बच्चे को एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य प्रदान करना है।