सिटी पोस्ट लाइव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिथिलांचल के समस्तीपुर से बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अभियान की शुरुआत कर दी है। अपनी पहली चुनावी जनसभा में, पीएम मोदी ने जातिगत और क्षेत्रीय भावनाओं को साधते हुए ‘पोखर और माछ’ (तालाब और मछली) के बहाने सहनी समाज (निषाद समुदाय) पर बड़ा सियासी दांव खेला।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मिथिलांचल में निषाद समाज की निर्णायक भूमिका को देखते हुए, पीएम मोदी का यह संबोधन इस समुदाय को एनडीए के पक्ष में एकजुट करने का स्पष्ट प्रयास है।
‘पग पग पोखर माछ मखान’ और मत्स्य योजना
पीएम मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत मिथिलांचल की प्रसिद्ध कहावत ‘पग पग पोखर माछ मखान, सरस बोल मुस्की मुख पान’ से की, जो यहां के जलाशयों की प्रचुरता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि इतनी प्रचुरता के बावजूद 2013 तक बिहार में लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए बाहर से मछली मंगवानी पड़ती थी।
पीएम मोदी ने दावा किया कि 2014 में केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद स्थिति बदली। उन्होंने ‘पीएम मत्स्य संपदा योजना’ शुरू करने और मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की सुविधा देने का उल्लेख किया। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार की योजनाओं की भी सराहना की, जिसने मछली पालकों को प्रोत्साहित किया।
पीएम ने कहा, “इसका परिणाम है कि आज बिहार में मछली का उत्पादन दोगुना हो गया है। अब बिहार की स्थिति यह हो गई है कि मछलियों को बाहर भेजा जा रहा है। मत्स्य पालक आत्मनिर्भर हो गए हैं और उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है।”
किसानों को लाभ और जंगलराज पर वार
मत्स्य पालकों के अलावा, पीएम ने केंद्र सरकार द्वारा छोटे किसानों के लिए किए जा रहे कार्यों को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार छोटे किसानों को सस्ता लोन दे रही है और ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ के माध्यम से सीधे उनके खाते में पैसा भेज रही है।
इस दौरान उन्होंने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए ‘जंगलराज’ का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, “जंगलराज में ये पैसा आपके खाते में आते थे क्या? बीच में ही चोरी हो जाती थी। एक पीएम (राजीव गांधी) कहते थे एक रुपये निकलते थे, 15 पैसे मिलते हैं। सोचने की बात है कि कौन पंजा 85 पैसे खा जा रहा है?”
पीएम मोदी का समस्तीपुर दौरा न केवल मिथिलांचल में चुनावी बिगुल फूंकने, बल्कि निषाद (सहनी) समाज को भावनात्मक रूप से साधने और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभार्थी बताने का एक सफल राजनीतिक प्रयास माना जा रहा है।