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दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपियों की स्थिति अन्य आरोपियों से “गुणात्मक रूप से भिन्न” है और वे UAPA की धारा 43D(5) की कठोर कसौटी पर खरे नहीं उतरते, इस कारण उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया।
जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ के तहत यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इस निर्णय में हर आरोपी की भूमिका को अलग-अलग परखा गया है और सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने से परहेज किया गया है। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप बनते हैं, इस कारण उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में जमानत देने से संबंधित निर्णय कानून और देश की सुरक्षा के हित में होना चाहिए। अदालत ने माना कि UAPA जैसे विशेष कानूनों में जमानत देने के मानदंड सामान्य मामलों से कहीं अधिक सख्त होते हैं, विशेषकर जब मामला देश की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा हो।
अन्य आरोपियों को मिली जमानत
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अन्य पांच आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी है। कोर्ट ने माना कि इन आरोपियों की भूमिका और परिस्थितियां अलग हैं, इस कारण उन्हें राहत दी जा सकती है।
अदालत की टिप्पणी: ट्रायल में देरी और राष्ट्रीय सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि UAPA जैसे कठोर कानूनों में ट्रायल की देरी एक गंभीर मुद्दा हो सकता है, लेकिन केवल देरी के आधार पर जमानत देना अनिवार्य नहीं हो जाता। अदालत ने सवाल उठाया कि जब ट्रायल लंबा खिंचता है, तो न्यायालय को हर पहलू को संतुलित तरीके से देखना पड़ता है, खासकर जब मामला देश की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा हो।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं, तो आरोपी की हिरासत जारी रखी जा सकती है। यदि आरोप टिकाऊ नहीं लगते, तो जमानत दी जा सकती है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आतंकवादी कृत्य केवल हिंसा तक सीमित नहीं होते, बल्कि आवश्यक सेवाओं को बाधित करना और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करना भी इसके दायरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ यह स्पष्ट संदेश दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े मामलों में कानून का शिकंजा ढीला नहीं होगा।