मेंस डे मनाने की असली वजह क्या थी? अधिकारों की बात पर उठते हैं बड़े सवाल…

Ritu Raj

हर साल 19 नवंबर को दुनिया भर में इंटरनेशनल मेंस डे मनाया जाता है, लेकिन अक्सर एक सवाल ज़ुबान पर आ ही जाता है कि महिलाओं के लिए तो पूरा महीना है, पुरुषों को एक दिन की क्या ज़रूरत? दरअसल यह दिन पुरुषों के “अधिकार” की मांग करने के लिए नहीं, बल्कि उन ख़ामोश दर्द और उन अनकही चुनौतियों को सामने लाने के लिए शुरू किया गया था, जिन्हें समाज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है। आइए जानते हैं कि आखिर इस दिन की शुरुआत कब और क्यों हुई, इसके मुख्य उद्देश्य क्या हैं।

इंटरनेशनल मेंस डे का विचार 1990 के दशक में आकार लेने लगा था, लेकिन इसे दुनिया के सामने औपचारिक रूप से 1999 में त्रिनिदाद और टोबैगो के प्रोफेसर डॉ. जेरोम तिलकसिंह ने रखा। उन्होंने 19 नवंबर को चुना, क्योंकि यह उनके पिता का जन्मदिन था, एक ऐसे इंसान जिन्हें वे अपना रोल मॉडल मानते थे। तिलकसिंह का उद्देश्य था कि पुरुषों के सकारात्मक योगदान को पहचान मिले और उन असली मुद्दों पर वैश्विक बातचीत शुरू हो, जिन पर आम तौर पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। हालांकि इससे पहले, 7 फरवरी 1992 को थॉमस ओस्टर ने भी इंटरनेशनल मेंस डे की एक पहल की थी। दुनिया में इसका सबसे लंबे समय तक चलने वाला आयोजन भी माल्टा में 7 फरवरी 1994 से मनाया जाता रहा। लेकिन 2009 में माल्टा की एएमआर कमेटी ने तारीख बदलकर इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 19 नवंबर के साथ जोड़ दिया। इस दिन की जरूरत अधिकारों की लड़ाई से ज्यादा उन समस्याओं के कारण महसूस की गई, जो चुपचाप पुरुषों की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। जैसे-लगातार बढ़ता तनाव, भावनात्मक दबाव और पुरुषों में आत्महत्या के चिंताजनक आंकड़े। इंटरनेशनल मेंस डे पुरुषों और लड़कों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सहयोग, रिश्तों में संवाद और मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने को बढ़ावा देने का प्रयास है। बता दें कि इस बार इंटरनेशनल मेंस डे की थीम Celebrating Men and Boys है।

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इंटरनेशनल मेंस डे का मुख्य उद्देश्य:
– समाज, समुदाय, परिवार, विवाह, बच्चे पालन और पर्यावरण में पुरुषों के सकारात्मक योगदान को सेलिब्रेट करना।
– सकारात्मक पुरुष रोल मॉडल्स को प्रमोट करना (न सिर्फ सेलिब्रिटी या स्पोर्ट्समैन, बल्कि आम मेहनती पुरुष जो ईमानदार जीवन जीते हैं)।
– पुरुषों और लड़कों के स्वास्थ्य व कल्याण पर फोकस करना – शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक।
– लिंग संबंधों में सुधार करना और जेंडर इक्वालिटी को बढ़ावा देना।
– पुरुषों के खिलाफ भेदभाव को हाइलाइट करना (जैसे सोशल सर्विसेज, कानून और सामाजिक अपेक्षाओं में)।
– पुरुषों और लड़कों के बीच बेहतर संबंधों को प्रमोट करना।

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