कब हुआ था देश में पहला SIR और क्यों ज़रूरी है हर चुनाव में इसकी भूमिका?…

Ritu Raj

लोकतंत्र की नींव मजबूत करने के लिए चुनाव आयोग ने दो दशकों बाद देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शुरू कर दिया है। बिहार से पायलट के तौर पर शुरू हुई इस प्रक्रिया में 69 लाख अपात्र नाम(मृतक, डुप्लिकेट और बाहर शिफ्ट हो चुके) हटाए गए हैं, जिससे राज्य की कुल मतदाता संख्या 7.43 करोड़ रह गई। अब उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, राजस्थान सहित 12 राज्यों की पुरानी वोटर लिस्ट फ्रीज कर दी गई है। दरअसल, पहली बार 1951 में आजाद भारत के पहले आम चुनाव से पहले लागू SIR अब तक 8 बार हो चुका है। यह घर-घर सत्यापन वाली प्रक्रिया न सिर्फ फर्जी वोटिंग रोकती है, बल्कि हर योग्य नागरिक को मताधिकार सुनिश्चित करती है।

हर चुनाव में SIR की भूमिका क्यों ज़रूरी है?
SIR हर चुनाव से पहले मतदाता सूची को साफ-सुथरा, सटीक और धोखाधड़ी-मुक्त बनाने के लिए अनिवार्य है। यह सामान्य वार्षिक संशोधन से अलग एक समयबद्ध, घर-घर जाकर सत्यापन वाली प्रक्रिया है, जो कई कारणों से महत्वपूर्ण है:
सटीकता और समावेश सुनिश्चित करना: यह सुनिश्चित करता है कि हर योग्य नागरिक (18 वर्ष से ऊपर) की नाम सूची में हो, जबकि मृत, डुप्लिकेट, स्थानांतरित या अयोग्य (जैसे अवैध प्रवासी) नाम हटाए जाएं। उदाहरण के लिए, बिहार SIR में 47 लाख नाम हटाए गए और 21 लाख नए जोड़े गए हैं।
चुनावी धांधली रोकना: डुप्लिकेट वोटिंग या फर्जी वोटरों को रोककर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है। यह लोकतंत्र की नींव मजबूत करता है, जहां कोई योग्य वोटर बाहर न रहे।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन: अदालत ने स्पष्ट किया है कि SIR में आधार केवल पहचान प्रमाण के रूप में इस्तेमाल हो, नागरिकता का नहीं, ताकि कोई वोटर का अधिकार प्रभावित न हो।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाना: यह जनसंख्या वृद्धि, प्रवास और डिजिटल बदलावों के साथ सूची को अपडेट रखता है। 2025 के पैन-इंडिया SIR में 51 करोड़ वोटरों को कवर किया जा रहा है, जो आगामी चुनावों (जैसे 2026 के विधानसभा) के लिए तैयार करेगा।

पुश नोटिफिकेशन के लिए सब्सक्राइब करें।

देश में पहला SIR कब हुआ?
भारत में Special Intensive Revision (SIR), जो मतदाता सूची (Electoral Roll) की विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया है, इसका पहला कार्यान्वयन 1951 में हुआ था। यह प्रक्रिया स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव (1951-52) से ठीक पहले शुरू की गई थी, जब चुनाव आयोग ने पहली बार देशव्यापी मतदाता पंजीकरण और सत्यापन का कार्य किया। 1951 में जनगणना के आधार पर 17.32 करोड़ मतदाताओं का पंजीकरण किया गया, जो उस समय दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अभ्यास था। SIR को तब से आठ बार (1951 से 2004 तक) दोहराया गया है, जिसमें आखिरी बार साल 2002-2004 में हुआ था। 2025 में बिहार में फिर से SIR किया गया, जो 20 वर्षों बाद एक प्रमुख पायलट था।

क्यों जरूरी होती है SIR?
समय के साथ वोटर लिस्ट में डुप्लिकेट नाम, पुराने पते, गलत स्पेलिंग और मृतकों के नाम जैसे कैंसर घुस जाते हैं- जो चुनावी धांधली का रास्ता खोलते हैं। कोई एक ही व्यक्ति दो जगह वोट डालता है, तो कोई शिफ्ट होने के बाद भी पुरानी सूची में अटका रहता है। इसीलिए चुनाव आयोग SIR को सर्जिकल स्ट्राइक की तरह इस्तेमाल करता है- घर-घर सत्यापन से गलतियां काटी जाती हैं, नए 18+ जोड़े नाम जाते हैं और सूची को फ्रीज कर निष्पक्षता लॉक की जाती है। बिहार में 69 लाख नाम हटने से साबित हुआ कि SIR बिना लोकतंत्र का इमरजेंसी वार्ड है। बता दें, 2026 चुनावों से पहले 12 राज्यों में यह प्रक्रिया 51 करोड़ वोटरों की DNA टेस्टिंग करेगी- ताकि एक व्यक्ति, एक वोट सिर्फ नारा न रहे, बल्कि हकीकत बन जाए।

Share This Article