सिटी पोस्ट लाइव
पटना। विश्व टीबी दिवस हर साल 24 मार्च को मनाया जाता है, ताकि क्षय रोग (टीबी) के प्रति लोगों को जागरूक किया जा सके। यह बीमारी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया के कारण होती है और दुनिया के कई हिस्सों में अब भी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। लेकिन कुछ लोग इस बीमारी को हराकर न सिर्फ खुद को, बल्कि समाज को भी आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं। आज हम एक ऐसे शख्स की कहानी लेकर आए हैं, जिनका सपना था आईआईटी में प्रवेश लेकर एक सफल इंजीनियर बनने का। मगर टीबी की बीमारी के चलते उनका यह सपना अधूरा रह गया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि अपनी असफलता को अपनी ताकत बनाया और सैकड़ों गरीब छात्रों को आईआईटी और एनआईटी में प्रवेश दिलाकर उनके सपनों को साकार किया।

कभी टूट गया था मैथमेटिक्स गुरु का सपना
बिहार के रोहतास जिले के रहने वाले आरके श्रीवास्तव, जिन्हें ‘मैथमेटिक्स गुरु’ के नाम से जाना जाता है, खुद कभी आईआईटी में पढ़ने का सपना देखते थे। लेकिन जब वे टीबी की चपेट में आए, तो उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़कर वापस गांव लौटना पड़ा। डॉक्टरों ने उन्हें 9 महीने तक आराम करने और दवा लेने की सलाह दी, जिससे उनका आईआईटी में प्रवेश लेने का सपना टूट गया। शुरुआती दिनों में वे काफी निराश थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपने हालात को अपनी ताकत में बदलने का फैसला किया। घर पर खाली बैठने के बजाय उन्होंने आसपास के गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। यहीं से उनके नए सफर की शुरुआत हुई।

जब मिशन में बदल गया सपना
अपने पढ़ाने के दौरान उन्होंने देखा कि कई होनहार छात्र सिर्फ पैसों की कमी के कारण अपने सपने पूरे नहीं कर पा रहे थे। क्योंकि बड़े शहरों में आईआईटी की कोचिंग लाखों रुपये फीस लेती है, जो ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए असंभव थी। जब आरके श्रीवास्तव पूरी तरह स्वस्थ हो गए, तो उन्होंने ठान लिया कि वह गरीब छात्रों की मदद करेंगे, ताकि किसी और छात्र का सपना अधूरा न रह जाए। उन्होंने गांव के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने की पहल की, जो धीरे-धीरे एक देशव्यापी मिशन बन गया।

‘1 रुपये की गुरु दक्षिणा’ ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान
आरके श्रीवास्तव ने शिक्षा में समर्पण का नया उदाहरण पेश किया। उन्होंने अपनी ‘1 रुपये की गुरु दक्षिणा’ वाली परंपरा शुरू की, जो शिक्षा को सेवा से जोड़ने का प्रतीक बन गई। उनके प्रयासों से अब तक सैकड़ों छात्र आईआईटी, एनआईटी और देश के अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पा चुके हैं। उनकी इस पहल की सराहना खुद भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी कर चुकी हैं। वे आज न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश में ‘मैथमेटिक्स गुरु’ के रूप में पहचाने जाते हैं।
‘अवसर ट्रस्ट’ से हजारों छात्रों को मिल रही नई दिशा
वर्तमान में आरके श्रीवास्तव पटना में ‘अवसर ट्रस्ट’ के जरिए सैकड़ों गरीब छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं। हर साल उनके मार्गदर्शन में कई छात्र अपने सपनों को साकार कर रहे हैं। टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझकर आरके श्रीवास्तव ने यह साबित कर दिया कि जीवन में कठिनाइयाँ आएंगी, लेकिन अगर हौसला मजबूत हो, तो कोई भी बाधा आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।