विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं सुशासन बाबू ?

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सिटी पोस्ट लाइव : सुशासन बाबू की पहचान रखनेवाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बढ़ते अपराध की वजह से विपक्ष के निशाने पर हैं.आंकड़ों के अनुसार  देश भर में बिहार 2021 तक भूमि सम्बन्धी विवादों में सबसे अधिक मुकदमे दर्ज करने वाला राज्य रहा है. बिहार  में 2021 में भूमि सम्बन्धी विवादों के 3336 मामले दर्ज हुए. इस वर्ष हत्या के प्रयासों के मामले भी सबसे अधिक बिहार में (8393 मामले) आये. बिहार 2021 में भी पुलिस और सरकारी अधिकारियों पर हमले के सर्वाधिक (150 मामले) दर्ज करने वाला राज्य था. दंगों के मामले में भी बिहार की स्थिति सबसे बुरे राज्यों में रही है.

भले ही विपक्षी दल राजद कितना भी शोर मचा ले और जद(यू) भी अपनी सेक्युलर छवि प्रदर्शित करे, लेकिन राज्य में दंगे-फसाद के हजारों मामले दर्ज होते हैं. वर्ष 2022 के भी जब आंकड़े आए थे तो बिहार में दंगों के 4736 मामले दर्ज हुए थे जिसमें से 60 मामले सांप्रदायिक-धार्मिक दंगों के थे. दंगों को इतिहास के हिसाब से देखें तो 2016 में बिहार तीसरे स्थान (139 मामले, 165 पीड़ित) और 2015 में देश में चौथे स्थान (79 मामले 146 पीड़ित) पर था. साइबर ठगी के मामलों में भी बिहार इस समय तक बाकी के राज्यों को पीछे छोड़ चुका था. ठगी के मामलों में 2022 में 35% की बढ़त आई और 10285 मामले दर्ज हुए. इसमें से 755 मामले सीधे एटीएम फ्रॉड के थे और राजस्थान-हरियाणा जैसे राज्यों से बिहार कहीं आगे निकल चुका था.

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पुलिस का इकबाल राज्य में कितना बुलंद है, ये आंकड़े भी बताते ही हैं. वर्ष 2022 के एनसीआरबी के आंकड़ों में बताया गया था कि साल भर में पुलिस पर हमले की 404 घटनाएँ हुईं जो उसके पिछले वर्ष 2021 की तुलना में करेब 300% अधिक थी. सिर्फ होल पर बिहार पुलिस पर हमले की दस वारदातें – अररिया, मुंगेर, पटना, समस्तीपुर और जहानाबाद में हुई हैं. अररिया और मुंगेर में दो पुलिसकर्मी मारे भी गए. एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर की हत्या अनमोल यादव को पकड़ने जाने पर और दूसरे एएसआई की हत्या हुई रणबीर यादव गैंग के हमला में हो गयी.

पुलिस के एडीजी पंकज दारद (लॉ एंड आर्डर) और एडीजी कुंदन कृष्णन (हेडक्वार्टर) कह चुके हैं कि गोली का जवाब गोलियों से दिया जाएगा, लेकिन इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि पुलिस की बिहार में साख गिर रही है. राजनीति में ये तेजस्वी यादव को मौका दे रही है कि नीतीश कुमार की सरकार को घेरा जाए, यानी नेताओं को इसका फायदा भी हो रहा है. बाकी रहा सवाल जनता का, तो वो शायद “सह लेंगे थोड़ा” कहकर कंधे उचका दे, क्योंकि चुनावों में थोड़ी देर तो है.

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