हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के पाकबड़ा थाना इलाके में एक शर्मनाक घटना सामने आई है, जो पूरे देश में सनसनी फैला रही है। चंडीगढ़ निवासी एक 13-14 वर्षीय छात्रा को दिल्ली रोड स्थित जामिया एहसानुल बनात गर्ल्स मदरसे में 8वीं कक्षा में दाखिले के लिए वर्जिनिटी सर्टिफिकेट (कौमार्य प्रमाण-पत्र) मांगा गया। जब छात्रा और उसके परिवार ने इस मांग को ठुकरा दिया, तो मदरसे ने उसका नाम रजिस्टर से काट दिया और ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) थमा दिया। छात्रा के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। भारत में वर्जिनिटी टेस्ट (जिसे अक्सर “दो-उंगली टेस्ट” या हाइमन परीक्षण कहा जाता है) पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक है। आइए विस्तार से समझते हैं।
वर्जिनिटी टेस्ट क्यों अवैध है?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (2013): सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में स्पष्ट आदेश दिया कि बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामलों में भी पीड़िता पर वर्जिनिटी टेस्ट नहीं किया जा सकता। यह टेस्ट वैज्ञानिक रूप से अविश्वसनीय है, क्योंकि हाइमन (योनि का आवरण) प्राकृतिक रूप से टूट सकता है (जैसे खेल-कूद या चोट से), और यह किसी की ‘कौमार्य’ साबित नहीं करता। कोर्ट ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन माना, जो महिला की गरिमा, गोपनीयता और स्वायत्तता पर हमला है।
संविधानिक आधार (अनुच्छेद 21): भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार शामिल है, जिसमें प्राइवेसी का अधिकार भी आता है। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2025 में एक मामले में दोहराया कि किसी महिला को वर्जिनिटी टेस्ट के लिए मजबूर करना अनुच्छेद 21 का स्पष्ट उल्लंघन है। यह टेस्ट पीड़िता को और अधिक अपमानित करता है, इसलिए इसे कभी नहीं करवाया जा सकता।
क्या सजा हो सकती है?
यदि कोई संस्थान, डॉक्टर या व्यक्ति जबरन वर्जिनिटी टेस्ट करवाने की कोशिश करता है, तो यह IPC की धारा 376 (बलात्कार के समकक्ष अपराध) या धारा 354 (हमला या आपराधिक बल) के तहत दंडनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में भी दोहराया कि ऐसे टेस्ट पर सख्ती बरती जाए। मुरादाबाद मामले में भी इसी आधार पर कार्रवाई हो रही है।