प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में सोशल मीडिया पर ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान के 11 वर्ष पूरे होने पर गर्व व्यक्त किया। लेकिन जब हम बिहार की राजधानी पटना की ओर देखते हैं, तो यह गर्व एक गहरे सवाल में बदल जाता है। नीट (NEET) की तैयारी कर रही दो छात्राओं की संदिग्ध मौत ने न केवल राज्य को झकझोर दिया है, बल्कि सुरक्षा के तमाम दावों की पोल खोल दी है।
मामला 6 जनवरी को तब शुरू हुआ जब पटना के चित्रगुप्त नगर स्थित शंभु गर्ल्स हॉस्टल में एक छात्रा बेहोशी की हालत में मिली। जो छात्रा महज एक दिन पहले (5 जनवरी) अपने सुनहरे भविष्य के सपने लेकर पटना आई थी, उसे 11 जनवरी को अस्पताल में दम तोड़ना पड़ा। परिजनों का आरोप है कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि साजिशन हत्या है। इस शक को तब और मजबूती मिली जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर पर चोट के निशान और बल प्रयोग के संकेत मिले।
जांच की सुस्त रफ्तार पर उठते सवाल;
हालांकि गृह मंत्री सम्राट चौधरी के हस्तक्षेप के बाद डीजीपी विनय कुमार ने SIT (Special Investigation Team) का गठन किया है, लेकिन घटना के 11 दिन बाद भी पुलिस के हाथ खाली हैं।
1) हॉस्टल की सुरक्षा: क्या हॉस्टल में रहने वाली बेटियां वहां सुरक्षित हैं?
2) पुलिस की भूमिका: एफआईआर दर्ज होने के बाद भी अब तक किसी ठोस नतीजे पर क्यों नहीं पहुँचा जा सका?
3) फॉरेंसिक साक्ष्य: क्या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की संभावना को पूरी तरह नकारा जा सकता है?
सियासत और समाज के बीच की खाई;
विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है, लेकिन राजनीति से इतर सवाल उन माता-पिता का है जिन्होंने अपनी ‘लक्ष्मी’ को पढ़ने के लिए बाहर भेजा था। बिहार की गौरवशाली परंपरा, जहाँ कन्या को देवी माना जाता है, आज व्यवस्था की विफलता के कारण सड़कों पर इंसाफ मांग रही है। “जब रक्षक ही मौन हों और कानून की प्रक्रिया सुस्त, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है।”