पटना की विशेष अदालत में शंभू गर्ल्स हॉस्टल के मालिक मनीष रंजन की जमानत याचिका पर लगातार दूसरे दिन गहमागहमी भरी सुनवाई हुई। यह सुनवाई न केवल लंबी चली, बल्कि सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर कई बड़े सवालिया निशान भी छोड़ गई।
बंद कमरे (In-camera) में हुई संवेदनशील सुनवाई;
मामले की गंभीरता और पीड़िता की निजता को देखते हुए, सीबीआई की महिला वकील ने ओपन कोर्ट में बहस पर आपत्ति जताई। इसके बाद जज ने मामले को संवेदनशील मानते हुए चेंबर में ‘इन-कैमरा’ कार्यवाही का आदेश दिया। लगभग 4 घंटे चली इस सुनवाई में से 2 घंटे तक दलीलें बंद कमरे में सुनी गईं, जो इस केस की जटिलता को दर्शाता है।

‘जब जांच नहीं करनी थी, तो फोन सीज क्यों किए?’
सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख सीबीआई के प्रति काफी कड़ा रहा। अदालत ने जांच की कछुआ चाल पर नाराजगी जताते हुए कई तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि अब तक पीड़िता और आरोपी के मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच क्यों नहीं हुई? जब एजेंसी ने कहा कि 8 फोन सीज हैं पर जांच बाकी है, तो कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा कि “जब जांच ही नहीं करनी थी, तो फोन जब्त करने का क्या मतलब?” हालांकि, छात्रा की मौत के बावजूद इसे अब तक ‘हत्या’ (Section 302) की श्रेणी में क्यों नहीं डाला गया? कोर्ट ने पूछा कि आखिर मौत की असली वजह (Cause of Death) का पता लगाने में इतनी देरी क्यों हो रही है?

गवाहों और बयानों पर सीबीआई की ‘लापरवाही’;
अदालत ने जब जांच की कड़ियों को जोड़ना शुरू किया, तो सीबीआई के पास कई सवालों के जवाब नहीं थे। घटना के वक्त पीड़िता के कमरे में जाने वालों में वार्डन और सफाईकर्मी का नाम आया, लेकिन सीबीआई अधिकारी वार्डन का नाम तक नहीं बता सके। सफाईकर्मी का बयान न दर्ज करने पर सीबीआई ने तर्क दिया कि वह ‘अनपढ़’ है। इस पर कोर्ट ने हैरानी जताते हुए पूछा कि क्या अनपढ़ होना बयान दर्ज करने में कोई बाधा है? कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि अब तक मुख्य आरोपी मनीष रंजन का बयान विस्तार से रिकॉर्ड क्यों नहीं किया गया और हॉस्टल के अन्य चश्मदीदों से पूछताछ क्यों नहीं हुई?

कोर्ट परिसर में बिलखती माँ का न्याय के लिए क्रंदन;
अदालत के बाहर का दृश्य किसी का भी दिल दहला देने वाला था। पीड़िता की माँ मीडिया और कानून के सामने न्याय की भीख मांगते हुए बेहोश हो गईं। उनके आरोपों ने प्रशासन और व्यवस्था की नीली रगों को झकझोर कर रख दिया। हालांकि, माँ का सीधा आरोप है कि हॉस्टल में नेताओं और प्रभावशाली लोगों के बेटों का आना-जाना था। उन्होंने दावा किया कि जांच एजेंसियां इन ‘बड़े नामों’ को बचाने के लिए मामले में लीपापोती कर रही हैं। उन्होंने रोते हुए पूछा, “क्या ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा सिर्फ अमीरों के लिए है? क्या एक गरीब की बेटी को इंसाफ नहीं मिलेगा?”