भूमिहार नेता अरुण कुमार की JDU में किसने रोकी एंट्री, क्या है इनसाइड स्टोरी?

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव : कभी बाहुबली नेता अनंत सिंह के एनकाउंटर की पुलिस की तैयारी से नाराज पूर्व सांसद अरुण कुमार के इस ऐलान से कि अगर ऐसा हुआ तो इसी पटना में पटककर नीतीश कुमार की छाती तोड़ देगें, बवाल मच गया था.अब 10 साल बाद वही अरुण कुमार को नीतीश की जरूरत के सहारे की जरुरत है. 4 सितंबर को JDU जॉइन करने वाले थे, लेकिन ऐन वक्त पर कार्यक्रम टल गया. अचानक उनकी एंट्री पर ब्रेक से सवाल उठा कि आखिरी वक्त में अरुण कुमार की जॉइनिंग किसने रोकी, एक सवाल ये भी है कि पहले भी JDU छोड़ चुके अरुण कुमार की जरूरत नीतीश को क्यों पड़ रही है?

पुश नोटिफिकेशन के लिए सब्सक्राइब करें।

सारी तैयारी हो चुकी थी फिर अरुण kumar की JDU में एंट्री पर कैसे रोक लग गई?3 सितंबर, दोपहर बाद करीब 4.50 बजे JDU की तरफ से मीडिया को ऑफिस सेक्रेटरी संजय कुमार सिन्हा की तरफ से आमंत्रण पत्र भेजा गया. इसमें बताया गया कि 4 सितंबर को दोपहर एक बजे पार्टी के स्टेट हेडक्वार्टर में मिलन समारोह होगा. इस मिलन समारोह में एक बड़े नेता को पार्टी की सदस्यता दिलाई जाएगी. 18 घंटे बाद 4 सितंबर को सुबह 11 बजे संजय कुमार सिन्हा की तरफ से एक और सूचना जारी की गई. इसमें बताया गया मिलन समारोह स्थगित कर दिया गया है. दरअसल, मिलन समारोह में जहानाबाद से दो बार सांसद रहे अरुण कुमार JDU में शामिल होनेवाले थे. अरुण kumar के अनुसार बिहार बंद को लेकर मिलन समारोह रद्द किया गया.लेकिन अभीतक उन्हें कोई अगली तारीख नहीं बताई गई है.

आखिर अरुण कुमार को JDU में शामिल होने से कौन रोक रहा है?अरुण कुमार ने साफ़ कर दिया है कि वो विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेगें लेकिन उनके लोग जरूर लड़ेंगे.उन्होंने कहा कि जो भी चुनाव लड़ेंगे, वे उनके परिवार से होंगे.गौरतलब है कि अरुण कुमार अपने बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल क्या कोई ऐसा है जो अरुण कुमार की JDU में एंट्री रोक रहा है?अरुण कुमार को पार्टी में वापस लाने की तैयारी 6 महीने से चल रही है. पार्टी के नेता इस बारे में लगातार उनसे बातें कर रहे है. अरुण कुमार खुद भी JDU में वापसी करना चाहते हैं.CM नीतीश कुमार के एक करीबी मंत्री और अरुण कुमार की उनके विधायक भाई अनिल कुमार के आवास पर मीटिंग भी हो चुकी थी. जून में जॉइनिंग तैयारी थी, लेकिन आखिरी वक्त पर सब रुक गया. तीन महीने बाद फिर से अरुण कुमार को पार्टी लाने की कवायद हुई. टाइम, मौका और जगह तय हो चुकी थी, लेकिन इस बार भी बात नहीं बन पाई.

इस पूरी कहानी के पीछे जाति की लड़ाई के साथ निजी टकराव भी बड़ी वजह बताई जा रही है. पार्टी के एक सीनियर लीडर अरुण कुमार की वापसी से खफा हैं.क्या अरुण kumar के JDU में आने से JDU को फायदा होगा?पिछले लोकसभा चुनाव में अरुण कुमार निर्दलीय लड़े थे. नीतीश कुमार के फैसले के कारण भूमिहार वोट बंट गए थे और JDU हार गई थी. अगर वे JDU में आते हैं तो भूमिहार फिर से JDU में जुड़ेंगे और पार्टी मजबूत होगी. ‘अरुण कुमार में इतनी ताकत है कि वे जिधर जाएंगे, भूमिहारों का एक बड़ा वोट बेस अपने साथ ले जाएंगे. दो बार वे जहानाबाद के सांसद रह चुके हैं. पूरे इलाके में उनकी पकड़ है.’JDU छोड़ने से पहले अरुण कुमार नीतीश के बहुत करीबी थे. अरुण कुमार और JDU के बीच टकराव की शुरुआत 2015 से हुई. तब नीतीश कुमार BJP के साथ बिहार में सरकार चला रहे थे. उसी वक्त नीतीश ने BJP को छोड़ा और RJD के साथ मिलकर सरकार बना ली.

सवाल-कहा जाता है कि पुटुष हत्याकांड के बाद अनंत सिंह के एनकाउंटर की तैयारी हो गई थी उस समय अरुण कुमार ने नीतीश kumar पर बड़ा हमला बोल दिया था.उसी साल मोकामा पुटुस हत्याकांड हुआ. पुटुस का असली नाम पवन कुमार यादव था. वह मोकामा के लहरिया पोखर गांव का रहने वाला था. 18 जून 2015 को छेड़खानी के विवाद में उसकी हत्या कर दी गई थी. इस मामले में मोकामा से विधायक रहे अनंत सिंह का नाम आया. उन्हें गिरफ्तार भी किया गया.अफवाह फैली कि पुलिस अनंत सिंह का एनकाउंटर कर सकती है.इस घटना से भूमिहार महागठबंधन की सरकार से नाराज हो गए. अनंत सिंह और अरुण कुमार दोनों भूमिहार कम्युनिटी से आते हैं. अनंत सिंह के एनकाउंटर की अफवाहों पर अरुण कुमार ने कहा था,अगर ऐसा हुआ तो इसी पटना में पटककर नीतीश कुमार की छाती तोड़ दूंगा.विवादित बयान का मामला कोर्ट तक पहुंचा और अरुण कुमार को 3 साल की सजा सुनाई गई. इसके बाद अरुण कुमार और नीतीश के बीच तल्खियां बढ़ गईं. इस दौरान अरुण कुमार JDU के सीनियर लीडर ललन सिंह के बारे में तीखे बयान देते रहे.लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) में रहते हुए अरुण कुमार ने आरोप लगाया था कि JDU अध्यक्ष ललन सिंह नीतीश कुमार को खाने या दवा में कुछ मिलाकर दे रहे हैं, जिससे मुख्यमंत्री को मेमोरी लॉस हो रहा है.

क्या ललन सिंह के खिलाफ बयान देना अरुण कुमार को महंगा पड़ रहा है? क्या उनकी वजह से उनकी JDU में एंट्री होते होते रुक गई?आगे अरुण कुमार का व्यवहार बदला. उन्होंने अपने बयानों पर सफाई भी दी और इसके मायने भी बताए. बीते कुछ महीनों से वे शांत भी हैं.लोकसभा चुनाव के बाद 31 अगस्त 2024 को जहानाबाद के प्रभारी मंत्री अशोक चौधरी ने भूमिहार कम्युनिटी के बारे में विवादित बयान दिया. इससे ये कम्युनिटी JDU से नाराज हो गई है. उन्होंने कहा, ’कुछ लोग जात-पात की राजनीति करते हैं.’नीतीश कुमार ने कभी ऐसा किया है कि भूमिहार के गांव में सड़क नहीं बनेगी. इसके बाद भी जब अति पिछड़ा को कैंडिडेट बनाते हैं, तो भूमिहार लोग भाग जाते हैं. वोट नहीं देते हैं. क्यों नहीं दीजिएगा भाई. 4-4 बार आपका उम्मीदवार खड़ा होगा और जीतेगा, तो आप बोलिएगा कि बढ़िया है. हमारे उम्मीदवार को कहिएगा कि खराब है. ये कैसे चलेगा.’

भूमिहारों के गढ़ में पार्टी के पास एक भी भूमिहार नेता नहीं है.जहानाबाद में JDU के पास कभी भूमिहार कम्युनिटी से दो ताकतवर नेता अरुण कुमार और जगदीश शर्मा थे. आज पार्टी के पास एक भी ऐसा नेता नहीं है, जो भूमिहारों को अपने पाले में गोलबंद कर सके.मई 2024 में भूमिहार आबादी वाले जहानाबाद में एक नारा लगा था, जगदीश शर्मा के सम्मान में अरुण कुमार मैदान में. 7 बार घोसी सीट से विधायक रहे जगदीश शर्मा JDU के बड़े नेताओं में शामिल थे और अरुण कुमार BSP के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे.दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव में जगदीश शर्मा बेटे राहुल शर्मा को टिकट दिलाना चाहते थे. पार्टी ने मौजूदा सांसद चंदेश्वर चंद्रवंशी को ही टिकट दे दिया. इसके बाद जगदीश शर्मा ने चुनाव से दूरी बना ली. इस चुनाव में RJD के सुरेंद्र यादव जीत गए. माना गया कि जगदीश शर्मा के सपोर्ट में भूमिहारों ने JDU कैंडिडेट की जगह अरुण कुमार और सुरेंद्र यादव को वोट दिया.इस वजह से जगदीश शर्मा पहले से JDU से नाराज चल रहे हैं. हालांकि उन्होंने अब तक इस्तीफा नहीं दिया है. चर्चा है कि वे इस बार बेटे राहुल शर्मा को घोसी से विधानसभा चुनाव लड़वा सकते हैं. जगदीश शर्मा की नाराजगी का खामियाजा JDU लोकसभा चुनाव में भुगत चुकी है. विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी कोई गलती नहीं करना चाहती, जिससे पार्टी को नुकसान हो.

जहानाबाद में NDA पिछले दो चुनावों से हार रही है. JDU मगध में खोई जमीन हासिल करने के लिए अलग-अलग प्रयोग कर रही है. अरुण कुमार को पार्टी में शामिल कराकर JDU भूमिहारों की नाराजगी कम करना चाहती है?अरुण कुमार का असर मगध के अलावा बिहार के सवर्ण आबादी वाले इलाकों में भी है. पॉलिटिकल पार्टियों के अलावा भूमिहार-ब्राह्मण सामाजिक राजनैतिक फ्रंट बनाकर भूमिहारों का मुद्दा उठाते रहे हैं. यही वजह है कि हर जिले में उनका असर है.लेकिन ललन सिंह की सहमती के वगैर JDU में उनकी एंट्री मुश्किल लगती है.आज की तारीख में ललन सिंह बिहार के सबसे ताकतवर भूमिहार नेता हैं.उनकी मर्जी के खिलाफ JDU में किसी दुसरे bhumihar नेता की एंट्री मुश्किल है.

Share This Article