बिहार पंचायत चुनाव 2026: चुनाव से पहले छिड़ा ‘परिसीमन’ का संग्राम! मुखिया संघ ने सरकार को दी कोर्ट जाने की चेतावनी

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में पंचायत चुनाव की आहट शुरू होते ही राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है। दिसंबर 2026 से पहले प्रस्तावित इन चुनावों से ठीक पहले ‘बिहार प्रदेश मुखिया संघ’ ने राज्य सरकार के सामने एक ऐसी मांग रख दी है, जिससे चुनावी प्रक्रिया के समय पर होने को लेकर पेंच फंसता नजर आ रहा है। मुखिया संघ ने दो टूक शब्दों में मांग की है कि आगामी चुनाव से पहले राज्य की सभी पंचायतों का नए सिरे से परिसीमन (delimitation) कराया जाए।

क्या है मुखिया संघ की प्रमुख मांग?
हाल ही में पटना में आयोजित मुखिया संघ की राज्य स्तरीय कार्यकारिणी बैठक में इस मुद्दे पर जोरदार चर्चा हुई। संघ का तर्क है कि राज्य में वर्तमान पंचायतें पुरानी जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति के आधार पर काम कर रही हैं। बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि जब तक पंचायतों का पुनर्गठन नहीं होता, तब तक चुनाव कराना तर्कसंगत नहीं होगा।

पुश नोटिफिकेशन के लिए सब्सक्राइब करें।

मुखिया संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि पिछले एक दशक में कई पंचायतों की आबादी में भारी इजाफा हुआ है। कुछ पंचायतें क्षेत्रफल में बहुत बड़ी हो गई हैं, जिससे वहां विकास योजनाओं का क्रियान्वयन और प्रशासनिक नियंत्रण कठिन हो गया है। इसके विपरीत, कुछ पंचायतों की जनसंख्या और संसाधन काफी कम हैं। संघ का मानना है कि ‘समान विकास’ और ‘प्रभावी प्रतिनिधित्व’ के लिए पंचायतों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण अनिवार्य है।

सरकार की बढ़ेगी मुश्किल, कानूनी लड़ाई की दी धमकी
मुखिया संघ ने केवल मांग ही नहीं की है, बल्कि सरकार को कड़ा अल्टीमेटम भी दिया है। संघ के नेताओं ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार उनकी मांगों की अनदेखी करती है, तो वे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि वे इस संबंध में पहले भी कई बार ज्ञापन सौंप चुके हैं, लेकिन सरकार के उदासीन रवैये ने उन्हें कानूनी रास्ता अपनाने पर मजबूर कर दिया है।

चुनाव पर क्या होगा असर?
जानकारों का मानना है कि यदि सरकार परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करती है, तो इसमें काफी समय लग सकता है, जिससे 2026 के अंत में होने वाले चुनावों में देरी हो सकती है। वहीं, अगर सरकार इस मांग को ठुकराती है और मामला अदालत में जाता है, तो कानूनी दांव-पेच के कारण चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगने का खतरा भी मंडरा सकता है।

बिहार की ग्रामीण राजनीति में मुखिया संघ का खासा प्रभाव है। ऐसे में चुनाव से पहले इस बड़े बवाल ने नीतीश सरकार के लिए ‘सिरदर्द’ पैदा कर दिया है। अब सभी की निगाहें पंचायती राज विभाग और राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

Share This Article