मांझी -चिराग की लड़ाई से हो सकता है एनडीए को नुकशान, महागठबंधन को फायदा .

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By Rahul

भिड़ंत से एनडीए को होगा भारी नुकसान! विधानसभा चुनाव में मगध- शाहाबाद की सीटों पर पुरानी रंजिश से बड़ा खामियाजा, दलित भी बंटेंगे

सिटी पोस्ट लाइव : जीतन राम मांझी और चिराग पासवान एनडीए की मुश्किल बढ़ सकते हैं. दोनों दलित नेताओं के बीच जारी जंग का असर चुनाव मे दिखाई दे सकता है. बिहार में विधान  सभा की  चार सीटों के लिए हुए उपचुनाव में एनडीए समर्थित दीपा के चुनाव प्रचार के लिए चिराग पासवान इमामगंज नहीं गए थे. इमामगंज विधानसभा क्षेत्र में 24000 के आसपास पासवान जाति के मतदाता थे. लेकिन वहां चिराग ने दीपा के पक्ष में प्रचार नहीं किया. तब से ही जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच दलित वोटों पर वर्चस्व की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है.

इमामगंज से प्रशांत किशोर के जनसुराज से प्रत्याशी जितेन्द्र पासवान को 37 हजार 103 वोट मिले थे. अगर चिराग वहां प्रचार को जाते तो पासवान का वोट मांझी की बहू को बड़े स्तर पर मिल सकता था. सियासी जानकारों का मानना है कि चिराग का इमामगंज नहीं जाना जीतन राम मांझी को रास नहीं आया. इसलिए दोनों की बीच आजतक ‘तनाव’ बना है.लोकसभा चुनाव 2024 में एनडीए को मगध और शाहाबाद की संसदीय सीटों पर बड़ा नुकसान हुआ. गया लोकसभा सीट के अतिरिक्त पाटलिपुत्र, आरा, जहानाबाद, बक्सर, सासाराम और औरंगाबाद में एनडीए उम्मीदवारों की हार हुई. एनडीए की हार का बड़ा कारण इन क्षेत्रों में दलित वोटों का छिटकना माना गया.

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मगध-शाहाबाद में कुल 11 विधानसभा की ऐसी सीटें हैं जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. विधानसभा चुनाव 2020 में भी इनमें से अधिकांश सीटें एनडीए के खाते में नहीं आई थी. पाटलिपुत्र में फुलवारीशरीफ और मसौढ़ी, गया में बाराचट्टी और बोधगया, औरंगाबाद में कुटुम्बा और इमामगंज, सासाराम में मोहनिया और चेनारी, बक्सर में राजपुर, आरा में अगिआंव और जहानाबाद में मखदमपुर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. 

 यादव जाति बिहार में सर्वाधिक आबादी वाली जाति है जबकि उसके बाद बिहार में पासवान दूसरे नम्बर पर हैं जो कुल आबादी के 5.311 फीसदी हैं. पासवान यानी दुसाध जाति के लोगों की संख्या 69 लाख 43 हजार है. जाति आधारित गणना रिपोर्ट-2022 में मुसहरों की आबादी 3.08 फीसद बताई गई है जो 40 लाख 35 हजार 787 हैं. वहीं भुईयां की आबादी 11 लाख 74 हजार, 460 है और इसे भी मुसहर की उपजाति के रूप में ही जाना जाता है. सियासी जानकारों का मानना है कि चिराग और मांझी के बीच अगर तनातनी बनी रही तो इससे दलित वर्ग में मुसहर और पासवान के वोटरों में बिखराव आएगा.  चमार वर्ग के वोटरों का कोई प्रतिनिधित्व चेहरा नहीं होने से एनडीए को इनसे भी झटका लग सकता है.

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