राहुल गांधी के फ़ॉर्मूला से बढ़ी जिलाध्यक्षों की मुश्किल, नहीं लड़ पायेगें चुनाव……

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सिटी पोस्ट लाइव :बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले ही कांग्रेस के जिला अध्यक्षों की चिंता बढ़ी हुई है. इसका कारण राहुल गांधी का पूर्व का एक ऐलान है बताया जा रहा है.राहुल गांधी के एक फैसले से बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह और वर्तमान अध्यक्ष राजेश राम के तीन दर्जन से ज्यादा करीबी नेता बे-टिकेट हो जायेगें. सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी ने जिलाध्यक्षों को इसबार विधान सभा चुनाव नहीं लड़ाने का फैसला ले सकते हैं.सूत्रों के अनुसार भोपाल में ऐसा निर्णय राहुल गांधी ले चुके हैं.

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राहुल गांधी ने कुछ महीने पूर्व भोपाल में कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के शुभारंभ के दौरान स्पष्ट रूप से कहा था कि जिलाध्यक्ष और अन्य संगठनात्मक पदाधिकारी चुनाव नहीं लड़ेंगे, उनका प्राथमिक काम संगठन को मजबूत करना होगा. साथ ही दिल्ली से भेजे गए ऑब्जर्वरों की निष्पक्षता पर कड़ाई से नजर रखी जाएगी और शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी. अब यही फार्मूला बिहार विधानसभा चुनाव पर लागू हुआ तो कांग्रेस के कई जिला अध्यक्ष जो टिकट की चाहत रख रहे हैं उनका पत्ता कट जाएगा.

संगठनात्मक कमजोरी और टिकट के लिए पैदा होने वाले गुटबाज़ी को खत्राम करने के लिए राहुल गांधी ऐसा फैसला ले सकते हैं.सूत्रों के अनुसार राजनीतिक मामलों की कमेटी में यह सुझाव आया कि यदि जिलाध्यक्ष चुनाव लड़ते रहेंगे तो वे संगठन के लिए समर्पित नहीं रह पाएँगे और स्थानीय नेताओं के साथ सत्ता-संबंधी समीकरण उलझेंगे. कमिटी ने ऑब्जर्वरों की भूमिका पर चिंता जाहिर की और पूछा कि अगर ऑब्जर्वर भेदभाव करेंगे तो उनका क्या होगा.इन दो सुझावों पर विस्तृत चर्चा के बाद — राहुल गांधी ने आगे से जिलाध्यक्षों की भूमिका स्पष्ट रूप से संगठनात्मक रखे जाने का फैसला सूना दिया.उन्होंने कहा कि ऑब्जर्वरों की जवाबदेही भी तय की जाएगी. “संगठन और चुनावी भूमिकाओं को अलग” करने के लिए अगर ऐसा ही फैसला राहुल गांधी बिहार में ले लेते हैं तो सभी जिलाध्अयक्बष चुनाव मैदान से बाहर हो जायेगें.

बिहार में अक्सर स्थानीय पॉलिटिक्स, जातीय समीकरण और ग्रासरूट लोकप्रियता पर टिकट आवंटित होते हैं — कई बार वही जिलाध्यक्ष अपने इलाके में सबसे मजबूत चेहरे होते हैं. ऐसे में अगर कांग्रेस इस नए फ़ॉर्मूले को कड़ाई से लागू करती है, तो संभावित नतीजे दो तरह के हो सकते हैं. इसमें एक संगठन मजबूत होने पर दीर्घकालिक लाभ होगा. संगठन-केन्द्रित नेता पार्टी को बूथ-स्तर तक सक्रिय कर सकते हैं, जिससे भविष्य में वोटिंग मशीनरी मज़बूत होगी. वहीं स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय जिलाध्यक्षों की पब्लिक डिमांड को खारिज करने पर स्थानीय कार्यकर्ता नाराज़ हो सकते हैं, जिससे चुनावी दौर में नुकसान हो सकता है.

bihar के ज्यादातर जिलाध्यक्ष विधान सभा चुनाव लड़ना चाहते हैं. यदि पार्टी जिलाध्यक्षों की लोकप्रियता को अनदेखा करते हुए केवल नियम लागू कर देगी, तो बिहार में यह कदम प्रतिकूल भी साबित हो सकता है. परंतु यदि कांग्रेस जिलाध्यक्षों को संगठनात्मक, चुनावी नहीं-पर भी प्रभावी भूमिका—जैसे चुनाव प्रबंधन, प्रचार समन्वय या पार्टी ब्रांड एंबेस्डर—देकर संतुलन बनाए रखेगी, तो यह रणनीति काम कर सकती है.

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