सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मतदाता सूची के गहन परिक्षण का मामला, चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती.

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव : बिहार में चुनाव से कुछ महीने शुरू मतदाता सूची के गहन परिक्षण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है. इस निर्णय की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) का कहना है कि इससे राज्य में लाखों हाशिए पर पड़े लोग मताधिकार से वंचित हो जाएंगे, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के खिलाफ है.ADR ने कोर्ट में कहा है कि ‘एसआईआर की दस्तावेजीकरण आवश्यकताओं, उचित प्रक्रिया की कमी और बिहार में मतदाता सूची के उक्त विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए अनुचित रूप से कम समय सीमा इस अभ्यास को लाखों वास्तविक मतदाताओं के नामों को मतदाता सूची से हटाने के लिए बाध्य करती है, जिससे वे मताधिकार से वंचित हो जाते हैं.’

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इस मामले को लेकर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने कोर्ट में चुनौती दी है. याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग का फैसला स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के खिलाफ है. एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है. एडीआर का कहना है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कई खामियां हैं.एडीआर ने अपनी याचिका में नागरिकता दस्तावेज की आवश्यकता पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इससे मुसलमानों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और प्रवासी श्रमिकों सहित हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. इन समुदायों के पास अक्सर आवश्यक दस्तावेज नहीं होते हैं.

एडीआर का कहना है कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी है. एडीआर के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया के तहत घोषणापत्र की आवश्यकता अनुच्छेद 326 का उल्लंघन करती है.एडीआर का कहना है कि बिहार में गरीबी और पलायन की दर बहुत अधिक है. कई लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र या माता-पिता के रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज नहीं हैं. अनुमान के अनुसार, 3 करोड़ से अधिक मतदाता एसआईआर आदेश में उल्लिखित कठोर आवश्यकताओं के कारण मतदान से बाहर हो सकते हैं.

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