बिहार में जमीन के ‘दोहरे खतियान’ के खेल पर लगा ब्रेक: अब कैडस्ट्रल सर्वे ही होगा निर्णायक, सरकार ने जारी किए सख्त निर्देश

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में जमीन विवादों को खत्म करने और सरकारी भूमि को माफियाओं के कब्जे से मुक्त कराने के लिए नीतीश सरकार ने एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने अब साफ कर दिया है कि एक ही जमीन पर दो अलग-अलग खतियान (कैडस्ट्रल बनाम रिविजनल) का सहारा लेकर मालिकाना हक जताने का खेल अब नहीं चलेगा। विभाग के प्रधान सचिव सी.के. अनिल ने इस संबंध में सभी जिलाधिकारियों को कड़ा दिशा-निर्देश जारी किया है।

कैडस्ट्रल सर्वे को माना जाएगा ‘सुप्रीम’
सरकार ने स्पष्ट किया है कि 1890 से 1920 के बीच हुआ कैडस्ट्रल सर्वे ही बिहार की भूमि का मूल और प्राथमिक आधार होगा। विभाग के अनुसार, यदि कैडस्ट्रल सर्वे में कोई जमीन सरकारी, सैरात या गैरमजरूआ दर्ज है, तो वही प्रविष्टि अंतिम मानी जाएगी।

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अक्सर यह देखा गया है कि बाद में हुए रिविजनल सर्वे में कई सरकारी जमीनों को निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिया गया। सरकार ने अब नियम कड़ा कर दिया है कि रिविजनल सर्वे में नाम दर्ज होने मात्र से कोई व्यक्ति उस जमीन का मालिक नहीं बन जाएगा, जब तक कि उसके पास सक्षम प्राधिकारी (समाहर्ता) द्वारा जारी किया गया वैध बंदोबस्त आदेश या मालिकाना हक का ठोस प्रमाण न हो।

शिकायतों के बाद सरकार ने लिया संज्ञान
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ और उपमुख्यमंत्री के ‘जन कल्याण संवाद’ के दौरान जिलों से लगातार फर्जीवाड़े की शिकायतें मिलीं। विशेष रूप से दरभंगा जिलाधिकारी द्वारा उठाए गए तकनीकी सवालों के बाद, 3 फरवरी को विभाग ने विस्तृत नियमावली जारी की। सरकार का मानना है कि दफ्तरों की मिलीभगत से हुए कागजी हेरफेर को रोकने के लिए पुराने रिकॉर्ड्स (कैडस्ट्रल) को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।

अवैध कब्जेदारों पर गिरेगी गाज
नए नियमों के तहत अब अंचल अधिकारियों (CO) को विशेष शक्तियां दी गई हैं: यदि कोई व्यक्ति सरकारी भूमि पर 30 साल से अधिक समय से काबिज है, तो भी वह जमीन उसकी नहीं होगी। प्रशासन ऐसे कब्जेदारों को नोटिस जारी करेगा और जमीन का संरक्षण सुनिश्चित करेगा। भूमि का स्वरूप केवल तभी बदला माना जाएगा जब राज्य सरकार के अभिलेखों में उसका आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद हो।

भू-माफियाओं के खिलाफ ‘एलान-ए-जंग’
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन भू-माफियाओं पर सबसे ज्यादा चोट पहुंचेगी जो सर्वे की विसंगतियों का फायदा उठाकर सरकारी जमीनों की खरीद-बिक्री कर रहे थे। सरकार की इस सख्ती से न केवल भूमि विवादों में कमी आएगी, बल्कि हजारों एकड़ सरकारी जमीन को भी वापस लिया जा सकेगा।

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