बिहार की राजनीति में इस समय ‘संख्या बल’ और ‘नैतिकता’ के बीच एक दिलचस्प जंग छिड़ी हुई है। ढाका विधायक फैसल रहमान प्रकरण ने राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जिसे शतरंज की भाषा में ‘चेकमेट’ कहा जा सकता है।

कार्रवाई में देरी;
कांग्रेस ने अपने बागी विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर अनुशासन का संदेश दिया है, लेकिन राजद के लिए स्थिति इतनी सरल नहीं है। राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती संवैधानिक आंकड़ों से जुड़ी है। राजनीतिक मजबूरी यह है कि यदि राजद फैसल रहमान को निष्कासित करती है, तो सदन में पार्टी की प्रभावी संख्या कम हो सकती है। वहीं, यदि कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, तो यह संदेश जाएगा कि नेतृत्व कमजोर है, जिससे भविष्य में अन्य विधायकों के भी मनमानी करने की संभावना बढ़ सकती है।

एक विधायक कम होने से नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर संकट क्यों?
बिहार विधानसभा के नियमों के अनुसार, मुख्य विपक्षी दल का दर्जा और नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी बनाए रखने के लिए एक निश्चित संख्या बल की आवश्यकता होती है। आमतौर पर सदन की कुल सदस्य संख्या (243) का 10% यानी कम से कम 25 विधायक नेता प्रतिपक्ष के दावे के लिए आवश्यक होते हैं। वर्तमान में राजद संख्या के मामले में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद ‘बॉर्डर लाइन’ पर सतर्क है। हालांकि राजद के पास अभी पर्याप्त संख्या है, लेकिन संकट यह है कि यदि एक विधायक पर कार्रवाई होती है, तो यह ‘डोमिनो इफेक्ट’ (एक के बाद एक गिरना) शुरू कर सकता है। चिराग पासवान और भाजपा के दावों के बीच, एक भी इस्तीफा या निष्कासन विपक्षी खेमे में भगदड़ मचा सकता है।