तिरंगे के रंगों वाली मिठाई खाना देशभक्ति है या अपराध? जानें क्या कहता है भारत का कानून…

Ritu Raj

हर साल 26 जनवरी और 15 अगस्त के मौके पर बाजारों में केसरिया, सफेद और हरे रंगों की मिठाइयों की बहार आ जाती है। जहां एक तरफ यह देशभक्ति का उत्साह बढ़ाती हैं, वहीं दूसरी तरफ कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या इन रंगों का खाने में इस्तेमाल करना ‘भारतीय ध्वज संहिता’ का उल्लंघन है?

मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला;
इस विषय पर कानूनी स्थिति 2021 में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले से बिल्कुल साफ हो गई थी। कोर्ट ने 2013 के एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि तिरंगे के रंगों वाला केक काटना अपमान या देशद्रोह नहीं है। सिर्फ रंगों का इस्तेमाल किसी वस्तु को ‘राष्ट्रीय ध्वज’ नहीं बना देता। वहीं, देशभक्ति भावनाओं में होती है, न कि केवल रंगों के प्रतीकात्मक उपयोग के विरोध में।

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रंग बनाम राष्ट्रीय ध्वज: क्या है अंतर?
कानून के अनुसार, केसरिया, सफेद और हरा रंग भारत की पहचान हैं, लेकिन जब तक इन तीनों रंगों के बीच अशोक चक्र न हो और उसे ध्वज के निश्चित अनुपात (3:2) में न बनाया गया हो, तब तक उसे तकनीकी रूप से ‘तिरंगा’ नहीं माना जाता। यदि खाद्य पदार्थ पर अशोक चक्र के साथ हूबहू झंडा बनाया जाए और फिर उसे पैरों से कुचला जाए या अपमानजनक स्थिति में छोड़ा जाए, तो वह अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

विवादों का इतिहास;
सचिन तेंदुलकर: 2007 में तिरंगे के रंगों वाला केक काटने पर उन्हें कानूनी नोटिस मिला था।
राजनीतिक हस्तियां: सोनिया गांधी और अन्य नेताओं के जन्मदिन पर भी ऐसे केक को लेकर विवाद हुए। हालांकि, अदालतों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि भावनात्मक विरोध और कानूनी अपराध में बहुत बड़ा अंतर होता है।

भारतीय कानून के मुताबिक, राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम (1971) तब लागू होता है जब जानबूझकर झंडे का अपमान किया जाए। तिरंगे के रंगों में रंगकर अपनी खुशी का इजहार करना या मिठाई बांटना देशभक्ति का एक तरीका है, अपराध नहीं। आप बिना किसी डर के इन त्योहारों पर तिरंगे के रंगों वाली मिठाइयों का आनंद ले सकते हैं, बस ध्यान रखें कि राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा हमेशा बनी रहे।

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